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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

कुछ अनकही बाते..

कोई नहीं जानता इस सोशल-मीडिया पर किस का कौन-सा पोस्ट आखिरी है? कौन सा कमेंट आखिरी है? बहुत पहले मैंने एक पोस्ट देखी, जिसमें मराठी में लिखा था- " आई-बाबा (माता-पिता) मुझे माफ़ करना.. मैंने जिस आसमान में उड़ने का सपना देखा था, उस आसमान से तीर बरसते हैं..मैं हिम्मत नहीं कर पाया..

इस पोस्ट को सैकड़ों शेयर मिले थे.. मैंने उस लड़के को स्टॉक किया। उसकी बाक़ी पोस्ट्स पर दो-चार लाइक्स थे..
फ्रेंडलिस्ट में पचास से ज्यादा लोग नहीं..दो-दिन बाद मैंने फिर चेक किया तो उसकी प्रोफ़ाइल रिमेम्बरिंग आ रही थी..
 उसने मुम्बई लोकल के सामने कूदकर जान दी थी..

हम सब भी तो यही करते हैं.. किसी के जीते जी उससे बात करना नहीं चाहते, और उसके मरने के बाद चार-साल पहले की बातें चेक करते हैं.. जाने-अनजाने में मौत हमें अपनी दस्तक का सुबूत देते रहती है.. मृतकों से किए वादे अक्सर निभाए जाते हैं,क्योंकि वे अब हमें छोड़ चले हैं और हमारे पास है केवल उनकी यादें और उनको दिए हमारे वचन जो निभाने को हम बाध्य है ..देखिए ना किस तरह हम में से कई लोग अपने गुजर चुके स्वप्नों के लिए कितना कुछ करते हैं..


ऐसे कितने की कम हम अपने वचन पालन के लिए करते हैं..
शायद हमारा हृदय उन्हें निभा कर स्वयं में संतोष खोजता है और साथ ही यह कल्पना करता है कि ऐसा करने से दूर जा चुके प्रियजन से कुछ जुड़ाव रखा जा सकता है..

क्यों, ऐसा क्या है उन यादों में, जो जीवित को बांधे रखता है.. और हम जब इंसान जिंदा होता है क्यों नहीं उसे समझ पाते? ऐसी कौनसी चीजे होती हैं कि कभी कभी हम एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते .. या उनसे बात भी नहीं करते .. और वहीं इंसान मर जाने के बाद उन यादों से लोग जुड़ जाते है ..!!



न्यूज़-मीडिया में काम करनेवाले एक लड़के ने ट्विटर पर ट्रोल होने के बाद लिखा-
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" अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया "

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