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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

कुछ अनकही बाते..

कोई नहीं जानता इस सोशल-मीडिया पर किस का कौन-सा पोस्ट आखिरी है? कौन सा कमेंट आखिरी है? बहुत पहले मैंने एक पोस्ट देखी, जिसमें मराठी में लिखा था- " आई-बाबा (माता-पिता) मुझे माफ़ करना.. मैंने जिस आसमान में उड़ने का सपना देखा था, उस आसमान से तीर बरसते हैं..मैं हिम्मत नहीं कर पाया..

इस पोस्ट को सैकड़ों शेयर मिले थे.. मैंने उस लड़के को स्टॉक किया। उसकी बाक़ी पोस्ट्स पर दो-चार लाइक्स थे..
फ्रेंडलिस्ट में पचास से ज्यादा लोग नहीं..दो-दिन बाद मैंने फिर चेक किया तो उसकी प्रोफ़ाइल रिमेम्बरिंग आ रही थी..
 उसने मुम्बई लोकल के सामने कूदकर जान दी थी..

हम सब भी तो यही करते हैं.. किसी के जीते जी उससे बात करना नहीं चाहते, और उसके मरने के बाद चार-साल पहले की बातें चेक करते हैं.. जाने-अनजाने में मौत हमें अपनी दस्तक का सुबूत देते रहती है.. मृतकों से किए वादे अक्सर निभाए जाते हैं,क्योंकि वे अब हमें छोड़ चले हैं और हमारे पास है केवल उनकी यादें और उनको दिए हमारे वचन जो निभाने को हम बाध्य है ..देखिए ना किस तरह हम में से कई लोग अपने गुजर चुके स्वप्नों के लिए कितना कुछ करते हैं..


ऐसे कितने की कम हम अपने वचन पालन के लिए करते हैं..
शायद हमारा हृदय उन्हें निभा कर स्वयं में संतोष खोजता है और साथ ही यह कल्पना करता है कि ऐसा करने से दूर जा चुके प्रियजन से कुछ जुड़ाव रखा जा सकता है..

क्यों, ऐसा क्या है उन यादों में, जो जीवित को बांधे रखता है.. और हम जब इंसान जिंदा होता है क्यों नहीं उसे समझ पाते? ऐसी कौनसी चीजे होती हैं कि कभी कभी हम एक दूसरे को देखना भी पसंद नहीं करते .. या उनसे बात भी नहीं करते .. और वहीं इंसान मर जाने के बाद उन यादों से लोग जुड़ जाते है ..!!



न्यूज़-मीडिया में काम करनेवाले एक लड़के ने ट्विटर पर ट्रोल होने के बाद लिखा-
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" अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया "

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