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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

जो कहा नहीं गया..

एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है।


दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं।

राह क्यों मुड़ी थी?

यात्री क्यों मिले थे?

अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था,

तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी?


मैं अक्सर सोचती हूँ

हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं?


कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं।

कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं।

तुम शायद दूसरे लोगों में से थे।


अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा?

कौन पढ़ेगा?

और अगर लिख भी दिया,

तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे

जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है?


मैं लिखूँ...


पर क्या लिखूँ?


कि तुम्हारे जाने के बाद

शामों का रंग बदल गया था?


कि बारिश अब भी होती है,

लेकिन भीगने का मन नहीं करता?


कि चाय आज भी दो कप बन जाती है,

फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है?


या यह लिखूँ कि

तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया,

बस कहना बंद कर दिया।


कुछ दुःख ऐसे होते हैं

जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते।

वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं—

धीरे-धीरे, चुपचाप।


और फिर एक दिन

मन के पुराने कुएँ की दीवारों पर

हरी नमी बनकर फैल जाते हैं।


मुझे डर है,

मैं भी किसी उदास पंक्ति में

काई बनकर रह जाऊँगी एक दिन।


कोई मुझे पढ़ेगा भी,

तो शायद सिर्फ़ उदासी पढ़ेगा।

उसे यह नहीं पता चलेगा

कि इस उदासी के पीछे

कभी एक बहुत उजला प्रेम था।


इसलिए...


तुम लौट जाओ।


उस जगह लौट जाओ

जहाँ तुम्हारी हँसी अब भी वैसी ही है,

जहाँ तुम्हें मेरी याद का कोई बोझ नहीं उठाना पड़ता।


मैं यहीं ठीक हूँ।


इन दीवारों,

इन सवालों,

इन अधूरी पंक्तियों के बीच।


क्योंकि कुछ यात्राएँ

मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं।


वे सिर्फ़ इतना सिखाने आती हैं

कि कुछ लोग पूरी उम्र साथ नहीं रहते,

फिर भी पूरी उम्र साथ चलते रहते हैं—

स्मृति बनकर।






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