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जो कहा नहीं गया..

एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है। दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं। राह क्यों मुड़ी थी? यात्री क्यों मिले थे? अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था, तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी? मैं अक्सर सोचती हूँ हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं? कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं। कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं। तुम शायद दूसरे लोगों में से थे। अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा? कौन पढ़ेगा? और अगर लिख भी दिया, तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है? मैं लिखूँ... पर क्या लिखूँ? कि तुम्हारे जाने के बाद शामों का रंग बदल गया था? कि बारिश अब भी होती है, लेकिन भीगने का मन नहीं करता? कि चाय आज भी दो कप बन जाती है, फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है? या यह लिखूँ कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया, बस कहना बंद कर दिया। कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं— धीरे-धीरे, चुपचाप। और फिर एक दिन मन के पुराने कुए...

मेरी कहानी.....

☆☆मेरी एक  कहानी ☆☆
☆☆ सुनो मेरी ही जुबानी ☆☆

☆☆बहुत खुश हूँ मैं फिर भी ☆☆
☆☆बहता है आँखो से पानी ☆☆

☆☆उदासी ओढ़े  और अकेला हूँ ☆☆
☆☆ पर चेहरा है नूरानी ☆☆

☆☆दिल मे ढेरो जख्मों को सहेजे☆☆
☆☆खुशिया बाटता हूं ☆☆

☆☆गर कोई हो उदास तो☆☆
☆☆ उसके लबों पर हंसी लाता हूं ☆☆

☆☆मेरी चाहत है बस यही ☆☆
☆☆बस अपनो का मिले प्यार ☆☆

☆☆मेरी किस्मत में नहीं था☆☆
☆☆ये मेरे नसीब की मेहरबानी ☆☆

☆☆बहुत कुछ पाया है☆☆
☆☆ तो खोया भी बहुत कुछ है ☆☆

☆☆बस गमों और दर्दो में अक्सर ☆☆
☆☆बहता आंखो से थोड़ा पानी ☆☆

☆☆लाख मिटा लूं अपने जख्मों को पर☆☆
☆☆बीते दिनों की रह जाती है निशानी☆☆☆

Comments

  1. लाख मिटा लूं अपने जख्मों को पर
    बीते दिनों की रह जाती है निशानी. ✍️💕❤️

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