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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Coffee....

Hii ऐसे कोई अकेले बैठकर कॉफी पिता है , उसने शर्ट की बाजू फोल्ड करते हुए पूछा ..

क्यों, किसी के साथ कॉफी पीने से कॉफी का टेस्ट बदल जाता है ?
इसने कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए पूछा...

"जब एक दिलकश हमसफ़र मिलने पर जिंदगी का टेस्ट बदल जाता है तो कॉफी क्या चीज है".
हां ! लेकिन साथी ठीक ना हो तो टेस्ट बिगड़ भी तो जाता है..!! अपना बैग उठाते हुए वो बोली

अरे ..! कहा चल दी अभी तो मैंने कॉफी शुरू की है ..

हां .. क्या पता तुम्हारी कॉफी का टेस्ट खराब कर दू.. !

"क्या पता एक खराब कॉफी से मेरे जिंदगी का टेस्ट सही हो जाए"

और ......

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