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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है।


ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं।


कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए।


समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है।


समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं।


लेकिन भीतर कहीं कोई पुरानी गाँठ अब भी मौजूद रहती है।


वह हमारे निर्णयों को प्रभावित करती है।


हमारे रिश्तों को प्रभावित करती है।


हमारे भरोसा करने की क्षमता को प्रभावित करती है।


कई बार हम किसी नए व्यक्ति से इसलिए दूरी बना लेते हैं क्योंकि किसी पुराने व्यक्ति ने हमें बहुत गहराई से तोड़ा था। कई बार हम किसी साधारण बात पर आवश्यकता से अधिक प्रतिक्रिया देते हैं, क्योंकि वह किसी पुराने दुःख की छाया को छू जाती है। और कई बार हम स्वयं भी नहीं समझ पाते कि हम इतना थका हुआ, इतना बेचैन या इतना असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं।


मन की गाँठों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे हमेशा दिखाई नहीं देतीं।


वे चुपचाप अपना काम करती रहती हैं।


जैसे किसी पुराने घर की दीवार में आई दरार, जो बाहर से रंगी हुई दिखती है, लेकिन भीतर धीरे-धीरे फैलती रहती है।


समस्या यह नहीं है कि हमारे भीतर गाँठें हैं। समस्या तब शुरू होती है जब हम यह मान लेते हैं कि वे हैं ही नहीं।


हम उन्हें अनदेखा करते हैं।


उन पर हँसी का पर्दा डाल देते हैं।


व्यस्तताओं की परत चढ़ा देते हैं।


या यह सोच लेते हैं कि यदि हम उनके बारे में बात नहीं करेंगे तो वे समाप्त हो जाएँगी।


लेकिन मन उन बातों को कभी पूरी तरह नहीं भूलता जिन्हें उसने गहराई से महसूस किया हो।


इसीलिए मन की सच्ची मुक्ति छिपाने में नहीं, स्वीकार करने में है।


यह स्वीकार करने में कि हाँ, मैं आहत हुआ था।


हाँ, मुझे दुःख हुआ था।


हाँ, मैंने किसी को खोया था।


हाँ, कुछ बातें आज भी मुझे परेशान करती हैं।


स्वीकार करना हारना नहीं होता। बल्कि वही उपचार की पहली सीढ़ी है।


जब हम अपने दुःखों को नाम देना सीखते हैं, तब हम उनसे मुक्त होने की दिशा में पहला कदम रखते हैं।


मन की गाँठें एक दिन में नहीं खुलतीं। उन्हें धैर्य चाहिए। करुणा चाहिए। और सबसे अधिक, स्वयं के प्रति ईमानदारी चाहिए।


कभी कोई बातचीत उन्हें थोड़ा ढीला कर देती है।


कभी कोई आँसू।


कभी किसी अपने का साथ।


और कभी अकेले बैठकर अपने भीतर झाँकने का साहस।


धीरे-धीरे हम समझने लगते हैं कि हमारे घाव हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे दुःख हमारी पूरी कहानी नहीं हैं। और हमारी टूटन हमारी अंतिम अवस्था नहीं है।


हम उनसे बड़े हैं।


बहुत बड़े।


मन की मुक्ति तब नहीं मिलती जब हम अपने भीतर की गाँठों को छिपा लेते हैं, बल्कि तब मिलती है जब हम उन्हें देखने, समझने और धीरे-धीरे खोलने का साहस जुटाते हैं।


क्योंकि अंततः शांति उन लोगों को नहीं मिलती जो कभी नहीं टूटे, बल्कि उन्हें मिलती है जिन्होंने अपनी टूटन को स्वीकार कर उससे एक नया जीवन गढ़ लिया।




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