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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Building ki khidki....

मेरे बिल्डिंग में कई खिड़कियां है

हर खिड़की में जिंदगी का चैनल चल रहा है
कहीं कोई ऑफिस से आया है थक के कहीं बच्चो का कौतुहुल चल रहा है ।

एक अंकल है जो खिड़की पर बैठकर फ्लैशबैक चला रहे है ...

एक लड़का है जिसका पहला प्यार हलचल कर रहा है ...
एक मां है जो खिड़की के उस पार हि रहती है हमेशा कुछ न कुछ करती हुई उसके पास खिड़की के पास आने का टाइम नहीं है..

एक औरत है जो खिड़की हमेशा बंद रखती है...

एक पति है जिसकी ट्रेन आज भी लेट हुई है

एक पत्नी है जिसने
कभी वो ट्रेन पकड़ी ही नहीं..
एक में हूं जो टुकड़ा टुकड़ा इन सबकी जिंदगी जी रही हूं

और

एक तुम हो जो मेरी खिड़की अपना रहे हो ....!!



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