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जो कहा नहीं गया..

एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है। दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं। राह क्यों मुड़ी थी? यात्री क्यों मिले थे? अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था, तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी? मैं अक्सर सोचती हूँ हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं? कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं। कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं। तुम शायद दूसरे लोगों में से थे। अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा? कौन पढ़ेगा? और अगर लिख भी दिया, तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है? मैं लिखूँ... पर क्या लिखूँ? कि तुम्हारे जाने के बाद शामों का रंग बदल गया था? कि बारिश अब भी होती है, लेकिन भीगने का मन नहीं करता? कि चाय आज भी दो कप बन जाती है, फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है? या यह लिखूँ कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया, बस कहना बंद कर दिया। कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं— धीरे-धीरे, चुपचाप। और फिर एक दिन मन के पुराने कुए...

Thirteen minutes.....

क्या तुम्हें याद है आख़िरी बार जब हम मिले थे ?
तुम मुझ से कुछ मिनट पहले पहुँच गयी थी,
मैं शायद कहीं काम में फँसा था वरना हर बार तुमसे पहले पहुँच जाता था,
न सिर्फ़ पहले पहुँचता..तुम्हारे लेट होने पर ग़ुस्सा भी करता,तुम्हें भी आज मौक़ा मिला था बदला लेने का,
जब मैं पहुँचा तो ग़ुस्सा थी तुम,मुझे याद नहीं मैंने तुम्हें मनाया कैसे,बस याद है तो तुम्हें आख़िरी बार देखना,याद है तो मेट्रो के बंद होते दरवाज़े,
तुम्हें याद है तुमने कहा था पूरे 13 मिनट लेट आये हो तुम आज...अब अगली बार मैं भी 13 मिनट लेट आऊँगी और तुम ग़ुस्सा नहीं करोगे ये 13 मिनट उधार है मेरे तुम पर।
पर मैं कहां जानता था कि वह अगली बार कभी आएगा ही नहीं,हमें दोनों को ही मालूम नहीं था ये मुलाक़ात आख़री होगी,तुम्हारे 13 मिनट आज भी उधार है मुझ पर,कभी फ़ुरसत मिले तो आना।
वही हूँ मैं तो आज भी,वहीं खड़ा हूँ उसी मेट्रो स्टेशन पर...इंतज़ार कर रहा हूँ तुम्हारा॥
काश़ मुझे पता होता वो मुलाक़ात आख़री होगी,,बहुत कुछ कहना था तुम से,मुझे आख़िरी बाहर आँखों ही आँखों से अपनी मोहब्बत का इज़हार करना था,मुझे तुम्हें परेशान करती गाल पर भटक रही बालों की उस लट को आख़िरी बार अपनी उंगली से रास्ता दिखाना था।
कभी फ़ुरसत मिले तो आना ज़रूर 13 मिनट ले जाना अपने।

#13min
हा याद है मुझे जब तुम आए थे और मैं गुस्से में थी ...तुम पूरे १३ मिनिट लेट थे और फिर हमने तुमसे मिन्नते करवाई थी हमे मनाने के लिए ।
पता है कितना अच्छा लग रहा था तुम्हारा यूं मनाना..!!
एक पल के लिए मन हुआ बस यही ठहर जाए ये लम्हे ...कितना कुछ कहना चाहते थे हम तुमसे वो सब कुछ जो मेरे दिल की बात हर
बार  होटों तक आके रुक जाती थी ...कितना कुछ अनकहा रह गया है जो मुझे तुमसे कहना है ..

सुनो, मुझे तुमसे कहने है
कुछ शब्द, कुछ बातें ,जिनमें सारे जज्बात है
 जो बस शुरू भी तुम से हुए हैं और खत्म भी तुम पर होते हैं ...
सुनो,
हम मिलेंगे फिर एक बार और
हा वो १४ मिनिट याद रखना जो मेरे उधार है तुम पर .....!!

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