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जो कहा नहीं गया..

एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है। दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं। राह क्यों मुड़ी थी? यात्री क्यों मिले थे? अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था, तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी? मैं अक्सर सोचती हूँ हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं? कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं। कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं। तुम शायद दूसरे लोगों में से थे। अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा? कौन पढ़ेगा? और अगर लिख भी दिया, तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है? मैं लिखूँ... पर क्या लिखूँ? कि तुम्हारे जाने के बाद शामों का रंग बदल गया था? कि बारिश अब भी होती है, लेकिन भीगने का मन नहीं करता? कि चाय आज भी दो कप बन जाती है, फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है? या यह लिखूँ कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया, बस कहना बंद कर दिया। कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं— धीरे-धीरे, चुपचाप। और फिर एक दिन मन के पुराने कुए...

Women's day.....

अच्छी लगती हैं वो औरतें जो मुझ से मिलती हैं तस्वीर बन कर..कितना कुछ लिखा होता है उनके चेहरे पर ...बहुत कुछ कहती और सुनती ये औरते....
मेंहदी से घुलती सफेद माँग ..खुले केश ..और अहसास..कितने सारे अनकहे ...

अपने प्रतिक चिन्हों पर रिझती कुछ औरतें अच्छी लगती हैं ..खुली साँस लेते हूए
घर से दफ्तर और फिर घर की तरफ़ ...!

झुलसते चेहरे और उस पर सन स्क्रीन की आर्टीफिशियल परत पर चढी थकान घर के बाहरी दरवाजे पर टाँग कर जब
चढाती है चाय खुद के लिए ..उबल के कम हो जाता हैं पानी और हिसाब लगने लग जाता हैं...

दिन भर की उन फ़रमाईशों का जो..कल रख दी गई थी पर्स और टिफी़न के डिब्बों में छौंक कर

मुझे अच्छी लगती है वो औरते जो सिर्फ कागज और canvas  उतारी गई पर रूह में नहीं.!


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