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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Dil to bacha hai

दो कश्ती में सवार रहती है जिंदगी ...
जिंदगी कभी उम्र का तकाजा कभी ख्वाइशों की उड़ान जिंदगी पर जो हावी हो इंसान उसी में रमता चला जाता है..

जब उम्र हावी होती है इंसान परिवक्वता की ओर अग्रसर होता है बढ़ती उम्र का प्रभाव जब जीवन मे होता है

 तो मनुष्य अपने आपको समझदार ओर सवेदन हीन सहनशील दर्शाता है फिर उस से उसे कितनी भी तकलीफ क्यों न हो..

ओर जब ख्वाइशों को इंसान अपना अरमान बना ले तो हर बन्धन को तोड़ कर उनके पीछा करने में लग जाता है फिर उम्र का बंधन नही रहता
बच्चों की तरह मस्ती और अपने लक्ष्य को पाने की जिद मे वो उम्र की कैद से खुद को आजाद कर लेता है ।
शायद तब कहते हैं
दिल तो बच्चा है जी...

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