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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Lal rang...

याद हैं मुझे वो पल जब तुमने कहा था तुम पर लाल रंग बहुत फबता हैं जानते नहीं तुम मेरी आँखों के सफेद हिस्सें में तब लाल डोरे उभरने लगे थे ..

अचानक होंठो की कोर का रंग भी सुर्ख़ होता हुआ गालों के गड्ढें तक पहुँचा था...!

माथे की बिंदी और हाथों की हरी मेंहदी भी लाल रंग को छेड़ती मचल उठी और कई दिनों से रक्खें हूए लाल दुपट्टें और चुनर के गीत गाने लगे थे.!

और अब.....

रक्तिम होते हूए शब्द कलश छलक कर बिखरने लगे हैं..जो बर्फ की सफेद चादरों में मैने यूँ ही ढाँके हूए थे...!

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