Skip to main content

Featured

Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Man

गाँव का सीधा साधा श्यामू , पहुँच गया महानगर
ढूढ़ने अपनी जीविका का साधन आता था उसको योगासन..

बडा शहर बडी रौनक,बडी मुश्किल से मिला उसे योग सिखाने के लिये एक संस्थान अमीर घरो की महिलाये आती थी वहाँ कुछ अपने जिस्म की चर्बी घटाने तो कुछ अपने जिस्म की भूख मिटाने...
संस्थान की मुखिया थी बडी तेज तरार करती थी योग की आड़ में ये कारोबार श्यामू जो अब बन गया था सैम...

उसे भी धकेल दिया इस व्यापार में बार बार अधिक पैसे कमाने के चक्कर में फंसता गया वो इस चक्रव्यूह में ज़ितना निकलना चाहता उतनी बुरी तरह फंसता जाता
अब पछताता है ,क्या मुंह दिखाऊँगा अपनी जीवन संगिनी को सोचा फिर गांव चला जाऊँगा
लेकिन मुखिया निकली बडी चालाक बोली इसमें तुम्हारा ही है लाभ ज्यादा पैसो से तुम दे सकते हो

सभी सुविधाये और बना सकते हो एक सुखी परिवार नही तो पहुचाँ दूँगी पुलिस स्टेशन वरना वो करो जो कहता है मेरा मन
कौन कहता है सिर्फ महिलाओ का होता है शोषण

कभी कभी कही कही पुरषो का भी लुट जाता है तन मन...!!

Comments

Post a Comment

Popular Posts