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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Man

गाँव का सीधा साधा श्यामू , पहुँच गया महानगर
ढूढ़ने अपनी जीविका का साधन आता था उसको योगासन..

बडा शहर बडी रौनक,बडी मुश्किल से मिला उसे योग सिखाने के लिये एक संस्थान अमीर घरो की महिलाये आती थी वहाँ कुछ अपने जिस्म की चर्बी घटाने तो कुछ अपने जिस्म की भूख मिटाने...
संस्थान की मुखिया थी बडी तेज तरार करती थी योग की आड़ में ये कारोबार श्यामू जो अब बन गया था सैम...

उसे भी धकेल दिया इस व्यापार में बार बार अधिक पैसे कमाने के चक्कर में फंसता गया वो इस चक्रव्यूह में ज़ितना निकलना चाहता उतनी बुरी तरह फंसता जाता
अब पछताता है ,क्या मुंह दिखाऊँगा अपनी जीवन संगिनी को सोचा फिर गांव चला जाऊँगा
लेकिन मुखिया निकली बडी चालाक बोली इसमें तुम्हारा ही है लाभ ज्यादा पैसो से तुम दे सकते हो

सभी सुविधाये और बना सकते हो एक सुखी परिवार नही तो पहुचाँ दूँगी पुलिस स्टेशन वरना वो करो जो कहता है मेरा मन
कौन कहता है सिर्फ महिलाओ का होता है शोषण

कभी कभी कही कही पुरषो का भी लुट जाता है तन मन...!!

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