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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Palash ho Tum...

सुनो , तुम पूछते हो ना क्यू खास हूं में...

हाँ  ,कुछ तो खास है शायद तू मेरा पलाश है
खिलखिलाती हंसी में तेरी ,जैसे खिलता हो चटक पलाश
शायद  खुद की अल्हड़ता करती हूँ मै तलाश एक जटिल आवरण में तू कोई छुपा हुआ कोमल सा अहसास है
कुछ अनकहा कुछ अनसुना कुछ तो आभास है

कुछ तो खास है शायद तू वो पलाश है
ज़िंदगी की धूप के सुनहरे रंग में अपनी लालिमा बिखेर छा जाता है जो फागुन की मस्ती खुद में समेट हा महक तो नहीं तुझमें पर रंग चढ़ने के बाद साथ नहीं छोड़ती

हाँ कुछ तो खास है शायद तू मेरा पलाश है तुझे जाना तो नहीं पूरी तरह पर महसूसती हूँ तटस्थता से

मिलाती हूँ अपनी सोच तुम्हारी सोच की व्यापकता से...तुम्हारी सोच जीवन की गहराइयों से भरी ...

हा तुम खास हो ..

तुम महसूस कराते हो पतझड़ में सब कुछ खो जाने के बाद भी जीवन पुनः खूबसरत हो सकता है...

जैसे किताब का पन्ना कोई खास है..

हाँ शायद तू वो पलाश है....💜💙




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