Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Tumhara nam...

जब जब भी तुम याद आते हो तो बेसाख्ता होठों पर तुम्हारा नाम आ जाता है

 तुम्हारे नाम को हलके से मैं बुदबुदाती हूं और यूं लगता है मानो पूरे वजूद में मिसरी सी घुल गयी हो...
कभी यूं भी होता है तुम याद आते हो और
आँखों से कुछ अश्क टपक उठते हैं
जैसे खुश्क से मौसम में अचानक अनचाही सी
बरसात हो गयी हो ,

कभी जब रातों को सोते सोते तुम याद आते हो तो लगता है मानों मेरे सिरहाने आकार तुमने
धीरे से अपना हाथ मेरे सर के नीचे रखा हो


और मैं मीठे से सपनों में खो जाती हूं..
अब तो नींदे भी हमसे रूठ गयी हैं
जिंदगी तन्हाई और वीरानों की हमनवां हो गयी है खुल के मुस्कुराए भी अरसा गुजर चुका है..!!

Comments

Popular Posts