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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Marriage...

भारत में लड़कियों की शादियाँ नहीं होतीं
वो सुपुर्द कर दी जाती हैं एक नर को
ठीक उसी तरह जैसे बिना देखे,उलटे रखे
ताश के पत्तों पर दांव लगा दिया जाता है

और शादी के अगले ही दिन वो शोख लड़कियाँ
तब्दील हो जाती हैं ज़िम्मेदार औरतों में जो अपने सुहागन होने की तमाम निशानियाँ ओढ़े सुबह से शाम तक चिपक जाती हैं हर घड़ी
एक नयी ज़िम्मेदारी से..

माँ के घर में बेतकल्लुफी से कहीं भी फ़ैल जाने वाली वो लड़कीध्यान रखती है कि कहीं छः न बज जाएँ नहीं तो एक और उलाहना जुड़ जाएगा उसकी रोज़मर्रा की जिंदगी में ..
अभी तो वैसे ही बहुत हिसाब देना है कि बाप के यहाँ से क्या सीख आई है और ये ताने वही औरतें उछालती हैं, जो कल तक लड़कियाँ थीं.. किसी और घर की या फिर वो लड़कियाँ जो औरत बन जायेंगी किसी और घर में हाँ, कुछ नर सुघड़ होते हैं और बहुत बेहतर भी ठीक उन ताश की बाजियों की तरह जो आप जीत जाते हैं

पर उनकी ये अच्छाई भी अहसान होती है उस औरत पर जो अभी भी अपने अन्दर उस लड़की को जिलाए हुए है

जो मायके से चलकर साथ आई थी..!!


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