Skip to main content

Featured

Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Pal...


हाँ- कह- दिया ....
एक पल में जैसे सब कुछ खत्म लौट जाओ......
कभी तो देखा होता मेरी तन्हा और वीरान रातो को कैसे सिसकती है तुम बिन इश्क़ रात भर बंद किवाड़ पर दस्तक देती रही पसरा रहा सन्नाटा हर और गूंजती रही मेरी आह..
याद है तुझे मेरे उन अहसासों से भरे अंतर मन पर तेरे यादो के मीठे लम्हे आवाज देती रही...

काश ! तुम सुन सकते रात भर इस कड़क ठण्ड में शोलो सा जलता रहा मन. ये कैसे समझ लिया  तुम जिंदगी नही सिर्फ जिस्म हो ये जो सांसे है न मेरी जिस्म में धड़कती है धड़कनो में जुडी है तुम्हारी साँसों से

खैर... तुमने सुना दिया अपना फरमान

सुनो ...लौट रही हूँ तेरे दर से अब सुबह जो दरवाजा खोलो तो देखना रात भर सर्द हवाओं कि थपेड़े से कैसे निशान बने है  मेरी मासूम मोहब्बत कैसी नीली पड़ गई जिस्म ठण्ड से सिकुड़ गई  लो तुम ने कहा न लौट जाओ

देखो में जा रही हूँ इस मिटटी के जिस्म को तेरे दर पर छोड़.....

Comments

Popular Posts