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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Dard ..


कुछ तो है,जो आधी रात को निकलता है मेरी खिड़की में से झांकते उस पेड़ के अंदर से...जिसकी डालियों ने मेरे आईने में देखा है...खेत की फसलों सा हरापन मेरी हर रौशनी को छू कर बड़े हुए उस पेड़ से....मेरे कमरे में छलाँग लगाता है दौड़कर मेरे बिस्तर में घुस जाता है..साँप की तरह रेंगते हुए मेरे सीने पे बैठ जाता है ठीक आँखों के सामने...फन उठा कर...में चौंक कर जाग जाती हूँ जैसे नींद में उसकी आहट सुन ली हो मैंने..

कुछ तो है जो मुझे तेज़ी से खींच कर धकेल देता है एक कुँए में,जिसका पानी कड़वा है...बेहद कड़वा..मैं वही घुटन फिर से महसूस करती हूँ, जिसको अपनी नींदों के हवाले करने मैंने दिन भर मशक्कत की थी..एक खारा सा बुखार बिजली की तरह मेरे जिस्म में फैल जाता है.. बदन का हर हिस्सा ठंडा... सुन्न,और रूह...तपती... सुर्ख लकड़ी..बस अपने घुटनों को सीने से चिपकाए दिन या रात के इल्म से दूर एक हरे भरे जंगल को जलता हुआ देखती हूँ। जिसका धूँआ मुझे उगता हुआ सूरज नहीं देखने देता..

वो "कुछ"सुबह छोड़ जाता है अपने बाद,एक मातम..और एक बीमार सा जिस्म...जो अपनी सुस्त आवाज़ में मुझसे कहता है.

"अब वो नहीं है तुम्हारे साथ ये मत भूलो" रात फिर मैं खिड़की बंद करने जाती हूँ, उस पेड़ के नाज़ुक पत्ते मेरे कानों में चीख कर कहते है..

कुछ पेड़ काटने भी पड़ते है....!!



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