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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Dard ..


कुछ तो है,जो आधी रात को निकलता है मेरी खिड़की में से झांकते उस पेड़ के अंदर से...जिसकी डालियों ने मेरे आईने में देखा है...खेत की फसलों सा हरापन मेरी हर रौशनी को छू कर बड़े हुए उस पेड़ से....मेरे कमरे में छलाँग लगाता है दौड़कर मेरे बिस्तर में घुस जाता है..साँप की तरह रेंगते हुए मेरे सीने पे बैठ जाता है ठीक आँखों के सामने...फन उठा कर...में चौंक कर जाग जाती हूँ जैसे नींद में उसकी आहट सुन ली हो मैंने..

कुछ तो है जो मुझे तेज़ी से खींच कर धकेल देता है एक कुँए में,जिसका पानी कड़वा है...बेहद कड़वा..मैं वही घुटन फिर से महसूस करती हूँ, जिसको अपनी नींदों के हवाले करने मैंने दिन भर मशक्कत की थी..एक खारा सा बुखार बिजली की तरह मेरे जिस्म में फैल जाता है.. बदन का हर हिस्सा ठंडा... सुन्न,और रूह...तपती... सुर्ख लकड़ी..बस अपने घुटनों को सीने से चिपकाए दिन या रात के इल्म से दूर एक हरे भरे जंगल को जलता हुआ देखती हूँ। जिसका धूँआ मुझे उगता हुआ सूरज नहीं देखने देता..

वो "कुछ"सुबह छोड़ जाता है अपने बाद,एक मातम..और एक बीमार सा जिस्म...जो अपनी सुस्त आवाज़ में मुझसे कहता है.

"अब वो नहीं है तुम्हारे साथ ये मत भूलो" रात फिर मैं खिड़की बंद करने जाती हूँ, उस पेड़ के नाज़ुक पत्ते मेरे कानों में चीख कर कहते है..

कुछ पेड़ काटने भी पड़ते है....!!



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