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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Meri jagah..

तुमने ढूंढा मुझे कभी, खिड़कियों के पल्लों के पीछे, दरवाजे के पीछे, घर की दीवारों में,
या दीवारों पर आई दरारों में...

तुमने कभी पर्दों को हटाकर देखा, या पाटन पर...घर के पीछे की अमराही में, या तुम्हारी सबसे पसंदीदा सुराही में...

कभी अपनी किताबों को खोलकर देख लेते,

तुम्हें ढूंढना चाहिए था..मुझे तुम्हारे आईने में, या तुम्हें अपने कांधे टटोलने चाहिए थे,अपनी आंखें देखनी चाहिए थी,

अपने होंठों से भीतर जाती हर एक पानी की बूंद में मुझे महसूस करना चाहिए था...

मैं हर जगह थी, हर उस जगह जहाँ मुझे होना चाहिए था…

तुमने ढूंढा ही नहीं, मैं वहीं थी ,
ठीक तुम्हारे बाजू में..

यहां से जाने के अगले पल से ही

वहीं थी ठहरी हुई तुम्हारे इंतजार में ...!!


Comments

  1. इतना बड़ा... इतना सुन्दर..
    लिखती कैसे हो.....???

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    1. बस लिख लेते है हमारी फीलिंग्स है ये

      Delete

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