Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

ईश्वर...

एक भटकाव मेरे जीवन को सदा परिभाषित करता रहा है , जिसमें जीवन अलगाव से जीती रही मैं - रातों से सुबह के पते मांगती रही और सुबह में ढूंढती रही निशानियां रात की..

मकानों में रहती रही.... उन्हें घरों में बदलती रही , लेकिन मेरे अंदर सिर्फ खंडहर ही घर किये रहा। उस खंडहर में भी तुम्हें ही तलाशा मैंने...

तुम्हारा नाम अनंत काल से जपा गया है कि मुक्ति को प्राप्त हो सकें सब जीवधारी..

मैं तो अपनी मुक्ति की परिभाषा की परिधि भी पूर्णतया तय नहीं कर पाई..!

कई बार मैं सिर्फ इस बात से भी मुक्त हो जाना चाहती हूँ कि जब मैं टूट कर बिखरुं तो मैं यह तुम्हारी मूर्ति के समक्ष न होने दूँ ...जो सिर्फ पथराई आँखों से मुझे रोते -बिलखती , नीरस बुत बनी देखती रहे ..!!

मैं अपनी मूढ़ ,कोमल, अबला आस्था की कैद से मुक्त हो जाना चाहती हूँ ..

मैं चाहती हूँ कि अंधेरों में जो बसर ढूंढ रही हूँ मैं, कम से कम वहाँ तो तुम्हारा नामो निशां न हो !

मुझे अंधी आस्था के लग्गे से टंगे उजाले नहीं तलाशने ..

मुझे मूर्खता और आस्था , विश्वास और अन्धविश्वास के बीच का अज्ञात सफ़र, नंगे पांव तय करना है और भटकना है तब तक, जब तक मैं एक किनारा न पकड़ लूं..

मुझे अब तुम्हारी खोज नहीं करनी ईश्वर ....

तुम जो चाहो.. तो मुझे उस किनारे बैठे मिल जाना....

Comments

Popular Posts