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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

That Window..

घर के दीवार में एक खिड़की रहती है..
उसी खिड़की से हम कभी बाहर और कभी खुद के अंदर झांकते हैं, बातें करते हैं, खुद  महसूस करते हैं..
पता है मेरी और खिड़की की दो दुनियाँ हैं,  एक दुनिया में मैं बाहर झांकती हूँ और दूसरी में  मेरे अंदर झांकती है, मुझे, मेरे मन को टटोलती है...बाहर खिड़की पर एक टुकड़ा आसमान लटकता है,आसमान के उस टुकड़े में चिड़िया है ,वृक्ष के हरे पत्ते हैं,और सफेद बादल भी हैं.. और हां उन बादलों में मैंने आपकी एक तस्वीर भी टांग दी है उसे कभी कभी चुपके से निहार लेती हूं ..
कभी हमसे मिलने बारिश भी आती हैं ..और वो बारिश की बूंदों में भीगी हुई वो खिड़की के साथ मैं मन ही मन भीग जाती हूँ, उस वक़्त सोच लेती हूँ के कैसे आप होते तो मुझे इस बारिश में जकड़ लेते....कभी कभी ना बाहर की दुनियां को यूंही चुपचाप ताकना अच्छा लगता है, वो खूबसूरत सी शाम को खिड़की पर उतरता देखना..शाम की लालिमा में हम दोनों आपकी यादो में रंग जाते है ..

हर रोज़ जब खिड़की के बाहर चाँद चमकता है तो उससे आपकी बाते होती है और फिर चांद भी आप ही की तरह हस कर मुझसे कहता है  "पागल हो तुम अरु " और दोगुनी तेज़ी से हँस कर मैं अक्सर चिढ़ा देती हूँ कि आपसे कम..कभी जब आपसे लड़ाई होती है तब खिड़की पर  शाम मिलने नहीं आती और बारिश भी अपने निशान नहीं छोड़ती ,धूप आती तो है पर उसमें एक चुभन महसूस होती है  ..उस दिन मानो बस उदासी छा जाती है और कुछ एक वक़्त के लिए सब कुछ ठहर जाता है..उस दिन चाँद आदतन नाख़ुशी ढ़ोता हुआ देर कर देता है और आप ही की तरह मुंह फूला लेता है ..उस दिन लगता है जैसे तारों ने टिमटिमाना थाम लिया हो और हवाएँ भटक गई हों इस शहर का पता खोजते खोजते ...और वो रात बेमतलब सी लम्बी लगती है उस वक़्त ऐसे लगता जैसे सुबह के वापस लौटने में कई राते ख़र्च करनी होगी..

कभी बाहर की दूसरी दुनिया जब खिड़की मेरे अंदर झांकती है तो उसे दिखती है एक चुभन, एक उदासी,आपके पास ना होने की...एक इंतज़ार दिखता हैं आपके आने का के कब आओगे आप, मेरे तन, मन, आत्मा को छूने...मुझसे बातें करने..हां वो खिड़की मेरे साथ उन हर लम्हों को जीती हैं जिन लम्हों को मैंने जिया है..

आपके साथ ..आपके बगैर ..!!


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