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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

That Window..

घर के दीवार में एक खिड़की रहती है..
उसी खिड़की से हम कभी बाहर और कभी खुद के अंदर झांकते हैं, बातें करते हैं, खुद  महसूस करते हैं..
पता है मेरी और खिड़की की दो दुनियाँ हैं,  एक दुनिया में मैं बाहर झांकती हूँ और दूसरी में  मेरे अंदर झांकती है, मुझे, मेरे मन को टटोलती है...बाहर खिड़की पर एक टुकड़ा आसमान लटकता है,आसमान के उस टुकड़े में चिड़िया है ,वृक्ष के हरे पत्ते हैं,और सफेद बादल भी हैं.. और हां उन बादलों में मैंने आपकी एक तस्वीर भी टांग दी है उसे कभी कभी चुपके से निहार लेती हूं ..
कभी हमसे मिलने बारिश भी आती हैं ..और वो बारिश की बूंदों में भीगी हुई वो खिड़की के साथ मैं मन ही मन भीग जाती हूँ, उस वक़्त सोच लेती हूँ के कैसे आप होते तो मुझे इस बारिश में जकड़ लेते....कभी कभी ना बाहर की दुनियां को यूंही चुपचाप ताकना अच्छा लगता है, वो खूबसूरत सी शाम को खिड़की पर उतरता देखना..शाम की लालिमा में हम दोनों आपकी यादो में रंग जाते है ..

हर रोज़ जब खिड़की के बाहर चाँद चमकता है तो उससे आपकी बाते होती है और फिर चांद भी आप ही की तरह हस कर मुझसे कहता है  "पागल हो तुम अरु " और दोगुनी तेज़ी से हँस कर मैं अक्सर चिढ़ा देती हूँ कि आपसे कम..कभी जब आपसे लड़ाई होती है तब खिड़की पर  शाम मिलने नहीं आती और बारिश भी अपने निशान नहीं छोड़ती ,धूप आती तो है पर उसमें एक चुभन महसूस होती है  ..उस दिन मानो बस उदासी छा जाती है और कुछ एक वक़्त के लिए सब कुछ ठहर जाता है..उस दिन चाँद आदतन नाख़ुशी ढ़ोता हुआ देर कर देता है और आप ही की तरह मुंह फूला लेता है ..उस दिन लगता है जैसे तारों ने टिमटिमाना थाम लिया हो और हवाएँ भटक गई हों इस शहर का पता खोजते खोजते ...और वो रात बेमतलब सी लम्बी लगती है उस वक़्त ऐसे लगता जैसे सुबह के वापस लौटने में कई राते ख़र्च करनी होगी..

कभी बाहर की दूसरी दुनिया जब खिड़की मेरे अंदर झांकती है तो उसे दिखती है एक चुभन, एक उदासी,आपके पास ना होने की...एक इंतज़ार दिखता हैं आपके आने का के कब आओगे आप, मेरे तन, मन, आत्मा को छूने...मुझसे बातें करने..हां वो खिड़की मेरे साथ उन हर लम्हों को जीती हैं जिन लम्हों को मैंने जिया है..

आपके साथ ..आपके बगैर ..!!


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