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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

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 तारे  आशु के सबसे करीबी रहे हमेशा .. 

आशु मां के जाने बाद  अकेले हो गई थी ... अब दादी ही उसकी "अाई" थी.. जब भी उसे मां की याद आती दादी आशु को छतपर लेकर जाती .. और तारो की तरफ हात दिखाकर कहती आशु तुम्हारी मां देखो तुम्हें देख रही बेटा ... फिर आशु बस दादी के गोद में उन कहानिया सुनते , कभी दादी के किस्से सुनते सुनते सो जाती ,आशु जैसे जैसे बड़ी हुई उसे अब रात का इंतज़ार रहने लगा कि कब रात हो और वो मा से सारे दिन की बाते कहे इसीलिए कभी उसे मां की कमी महसूस नहीं हुई 

हां पर उसे कभी कभी मां के गोद की मां के आंचल की छाया की कमी महसूस जरूर होती थी .. आशु ने अब एक छोटी सी दुनिया बना ली थी वो, उसके तारे और डायरी ..  

हर रात जब वो घर पर थकी हुई आती हैं .. दिनभर की आपाधापी के बाद , जब कभी आशु बीमार भी हो जाती है ,.. अकेली सी वो कोई नहीं बोलने को .. उसे बस एक बार पूछने को आशु कैसी हो? ठीक तो हो ना ? 

तब वो चली जाती हैं अपने तारो के पास कभी कभी बस जी भर कर रो लेती है , कभी उनके साथ हस लेती .. और आज भी वही नन्ही आशु उन तारो में ढूंढ़ती हैं ...

अपनी मां..!!


आशु ने सब लिखा बस कभी लिख नहीं पाई तो 

मां को ...! 

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