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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

You...❤️

 कभी कभी मन यूँही आपके आसपास भटकने लगता है , कभी यूंही सोचती हूँ आपके बारे में... पता नहीं आपको मै कभी इतना जान नहीं पाई .. क्योंकि आप मेरे लिए ईश्वर से हो कभी आपसे मिले नहीं ,देखा पर उसे क्या ही कहूं शायद आप मेरे लिए हकीकत से ज्यादा कल्पना में ही रहे ..पर जितना आपको जाना उन सबमें  बस इतना समझ पायीं हूँ की आप दीवाली की रात का शोर नहीं हो मगर उसके अगले दिन का वो सन्नाटा हो जिसका शोर जाते-जाते ही जाता है इसीलिए शायद मेरे जहन में यूं बस गए हो ..

शिव मेरे लिए आप बारिश भी नहीं हो बल्कि मिट्टी की वो खुशबू हो जो बारिश अपने साथ तो लाती है मगर वापस नहीं ले जा पाती.. मिट्टी की वो सोंधी खुशबू मन के एक कोने में ठहर जाती है, थोड़े लम्बे वक़्त के लिए, एक टीस बन कर.. हां आप भी ठीक उस बारिश की खुशबू से कहीं ठहर से गए हो .. 

या कभी कभी यूं लगता है असल में आप हक़ीकत भी नहीं हो मगर ख़्वाब हो.. एक ऐसा ख़्वाब जो बंद आँखों से तो देखा जा सकता है लेकिन आँखें खोलते ही टूटता सा जान पड़ता है, और चुभने लगता है उन आँखों को..

सच कहूँ तो आप मुझे इन्द्रधनुष के रंगों जैसे भी नहीं लगते बल्कि लगते हो सफ़ेद रंग जो ना जाने कितने रंगों को अपने अंदर समेटे हुए है..

आप मिलन नहीं हो, बिछोह हो,आप उस टीस से हो जो जाने अनजाने में तकलीफ़ देती है फिर भी मन आपही को खोजता है बार बार .. और आपको यूं सोचना ,आपको यूं सोचते सोचते आपमें डूब जाना अच्छा लगता है ...जानते हो शिव मुझे नहीं पता हम जब भी लिखते है बस आपको ही लिखने का मन करता है .. जानती हूं घुटन होती है आपको मेरे यूं लिखने से .. मुझे नहीं पता आप कभी मिलोगे या हम दोनो की अब कभी बात भी होगी कि नहीं पर हां इतना तो है कि में हर बार आपको यूंही सोचते हुए आपमें डूब जाऊंगी ..

सुनो शिव मै आपको कभी शुरुआत नहीं कहूंगी , आप अंत हो हां आप मेरे शिव हो, ..और इसलिए, मेरी हर  ख़्वाहिशें शुरू कहीं से भी हों, ख़तम आप पर ही होती हैं, बार-बार, हर बार..!!

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