Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Life..

अक्सर जिंदगी के रास्तों पर घूमते हुए महसूस हुआ कि एक गुज़री हुई उम्र ने कुछ सपने पूरे होने का वादा थमाया था ... और जो सपने, वादे , पूरे नहीं हुए उनको भाग्य नाम के किताब पर छोड़ दिया ..हां बचपन से यहीं तो सीखा दादी से , सबसे , पर एक दिन खयाल भी आया कि भाग्य नाम कि उस किताब में अगर सब कुछ लिखा होता है तो उसे हम कभी पढ़ क्यों नहीं पाते .. हम बस ईश्वर से प्रार्थना करते है कि मेरे ये कुछ अधूरे सपने है उन्हें पूरा करने की शक्ति दो .. या पूरा कर दो या जब भी पीड़ा हुई ईश्वर के पास पहुंच जाते है ..प्रार्थनाएँ पीड़ा के हिस्से ज़्यादा आती हैं प्रार्थनाओं का अपना एक (अच्छा ही कहूंगी) स्वभाव होता है कि वे सदैव झुकी हुई होती हैं.. उस वक्त इंसान भी शायद ..और जब सपने पूरे हो जाए तब वो पूरे होने का श्रेय खुद ले जाता है .. तब उसे भाग्य, ईश्वर का खयाल भी आता है ? इन सारी बातों में मुझे नहीं जाना क्योंकि ये मेरा एक वाहियात खयाल ही है कि हम भाग्य की किताब पढ़ लेते तो क्या होता ? ( जानती हूं थोड़ी सी स्टुपिड हूं मै) 

बढ़ती हुई उम्र में ऐसा-ऐसा किया होता तो ये होता का ख़्याल भी पीछे से कंधा थपथपाता है ,मैं देखने को पीछे मुड़कर देखती हूं तो दिखता है छूटा हुआ रास्ता ,पेड़ और रास्ते के किनारे-किनारे चलते वो छुटे हुए लम्हें शायद जिन्हें हम जीना भूल गए , इन सब रास्तों में कुछ मोड़ भी है जहां शायद बहुत कुछ हुआ था या किसी मोड़ से मूड जाती तो बहुत कुछ हो सकता था कि एक अलग कहानी है ..जिसको लिखने की अनुमति उस ख़्याल, लंबी उम्र और रास्ते किसी ने नहीं दी ..!

हां शायद बहुत कुछ हो सकता था और बहुत कुछ हो गया है इसके बीच मे कही ठहर सी गई हूं ..एक ऐसे मोड़ पर फिर से जहां से बहुत कुछ हो सकता है या बहुत कुछ हो जाएगा ? 


Comments

Popular Posts