Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Shiv..

 आज का पूरा दिन बस फिर कुछ यूंही ही कश्मकश में गया कि आज से आप को नहीं लिखेंगे .. बहुत कोशिश की लिखने की जिसमें “ आप ” ना हो मगर बगल में बैठा एक प्रश्न भी था लिखूं तो क्या लिखूं...?

 और वो प्रश्न बगल में बैठे किसी दोस्त सा चाय पीते हुए हर शब्द के साथ एक ताना दे रहा है कि “ क्या हुआ कुछ आया उनके बगैर थोड़ा सा भी लिखना .. और फ़िर मैंने भी तो उसे ये चाहने के साथ नहीं कह पाती कि मैं आपका जिक्र किए बैगर दूसरा भी कुछ लिख सकती हूं समझे तुम.. ! 

यही सच है और मैं यह जानती हूं ,अब चुप रहो ...

मगर नहीं कह कही पाती क्या करू... मुझे नहीं पता कि मेरे लगभग लिखे में “ आप ” आ जाने का कारण मेरा आपके प्रेम को कलम का समर्पण है या मेरी लेखकीय स्तर पर वैचारिक दृष्टिकोण का अभाव.. और मुझे ये भी समझ नहीं आता कि मुझे इस समर्पित प्रेम पर इतराना चाहिए या इस अभाव पर दुख व्यक्त करना चाहिए ... 

पर क्या मुझे पता भी है क्या होता है लेखक होना ? 

ख़ैर, जो मुझे पता है वह इतना कि बचपन से चांद तारों के साथ , पेड़ों के साथ होने वाली सालों से हो रही बातों के इर्द-गिर्द भी अब बार-बार “ आप ”आते हो ..!!

मुझे नहीं पता क्या होता है अच्छा लेखक होना ... मगर मैं जानती हूं कि आपको लिखते समय जैसे जी उठती है मेरी कलम ,मेरी कल्पना ... वो लंबे पेड़ , वो तारों के साथ कि बातों में “ आप” को इर्द-गिर्द पाते ही झूम उठते है ...

एक बात कहूं ... मैं अब आपको बिल्कुल नहीं सोचती मगर मैं “ आप ” को बखूबी लिख देती हूं ... ये सब कहते हैं ... वो पेड़ ,तारे ,बादल , बारिश , आकाश ...एक लेखक की जिनसे निरंतर बात होनी चाहिए , क्यों ? क्या पता शायद सब ऐसा कहते है .. 

मगर इन सबसे ज्यादा आपको लिखना हर बार मेरे लिए बहुत मायने रखता है क्यूं क्यूंकि आपको लिखना मतलब आपसे बात करना जैसा है .. आपके मेरे पास होने का एहसास है शायद इसीलिए मै सिर्फ़ "आपको" लिखती हूं..

अब ये बात आप उस सवाल को बता देना ..!

~आपकी अरु 

Comments

Popular Posts