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मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...
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कुछ अनकही बाते
औरतें डरती है विधवा होने से या अलग होने से .. इसीलिए वो ख़ुश होती है
“सदा सुहागन “के आशीर्वाद से ..
क्यूँकि वो जानती है की पति के बाद उसकी ज़िंदगी को पहाड़ बना दिया जाएगा .. और वंचित कर दिया जाएगा हर शुभ कार्य से ..वो छुपा लेती है ख़ुद क़ो किसी त्योहार के दिन जैसे किसी स्टोर रूम में पड़ा सामान.. क्या तुमने कभी ग़ौर किया है कैसे वो समय से पहले बूढ़ी हो जाती है ..जब उनके दिल के रास्ते कभी ना ख़त्म होने वाले highaway में तब्दील हो जाते है ..उलझ जाती है वो ज़िंदगी के किसी चौराहों पर..लिख दिया जाता है उनके हातों की लकीरों पर अभागन ..सफ़ेद पैरों वाली..
इसीलिए वो हमेशा डरती है हमेशा खोने से..पर क्यूँ नही डरता पुरुष औरत को खोने से क्यूँकि वो जानता है ,यहीं समाज उसे पहाड़ जैसी ज़िंदगी का हवाला देकर अनुमति देगा फिर से ब्याहने की
एक कुँवारी से...!!
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