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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

अधुरी एक कहाणी..

 भातुकलीच्या खेळामधली राजा आणिक राणी

अर्ध्यावरती डाव मोडला, अधुरी एक कहाणी ॥धृ॥


राजा वदला, “मला समजली, शब्दांवाचुन भाषा

माझ्या नशिबासवे बोलती तुझ्या हातच्या रेषा”

का राणीच्या डोळां तेव्हा दाटुनि आले पाणी ? ॥१॥


राणी वदली बघत एकटक दूरदूरचा तारा

“उद्या पहाटे दुसर्‍या वाटा, दुज्या गावचा वारा”

पण राजाला उशिरा कळली गूढ अटळ ही वाणी ॥२॥


तिला विचारी राजा, “का हे जीव असे जोडावे ?

का दैवाने फुलण्याआधी फूल असे तोडावे ?”

या प्रश्नाला उत्तर नव्हते, राणी केविलवाणी ॥३॥


का राणीने मिटले डोळे दूर दूर जाताना ?

का राजाचा श्वास कोंडला गीत तिचे गाताना ?

वार्‍यावरती विरून गेली एक उदास विराणी ॥४॥

~ मंगेश पाडगावकर

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