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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Jindagi

 लौट जाती है रात हमारे दरवाज़ों से ख़ालीमन किसने नहीं सुनी उसकी खामोशी

डूबता सूरज टकटकी लगाए हमारी खिड़की पर देता रहा दस्तक ..किसीने नही सूना उसका ख़ालीपन ..फूल मुरझा गए किताबों में दबे पड़े..किसीने नहीं सूनी दास्ताँ उनकी..टूटते हुए तारों क़ो भी कहना था शायद बहुत कुछ..किसी ने नहीं सुना उनको भी सबने बस अपनी ही कहीं ..नहीं सूनी किसीने मुँडेर पर आयीं चिड़ियाँ की ..नहीं सूना किसीने नदियों क़ा संगीत .. 

नदीयाँ सुनाती रहीं अपने मिलन क़े गीत .. क़िसी ने जवाब में हाथ नहीं हिलाया ऊन बादलों क़ो ज़ब वो आये थे आंसमा क़ा प्रेम लेक़र ..समंदर रोज़ किनारे पर आकर रोज़ ढूँढता है जा चूके प्रेमी क़े पैरों क़े निशान ..सुनाती है लहरे भी दूर गए प्रेमी की कहानी क़ोई..


कितना कुछ कहाँ गया हमसे ..!!


हम सुनते कहाँ है?


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