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मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...
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Moments
: - तुमने पूरी पुस्तक पढ़ ली?
:- हाँ बहुत अच्छी किताब थी..
:- अच्छा
:- हां पता है जब मै पढ़ रहा था मुझे हर वाकये पर तुम्हारा चेहरा झलक जाता..
खास करके जहाँ नायिका बादलों से कहती है, "ओ बादल तुम्हे ये आसमां कितना प्यारा
लगता है, ये दिन और ये रात, जैसे जिंदगी के ऊँच और नीच और क्या था वो..
:- जैसे बादलों में एक छोटा सा घर जैसे आसमां का छत , हो एक घर भी ..
और दोनो चुप हो जाते है , और लड़की की आंखें शर्म से झुक जाती है .. और लड़का उसके चेहरे की तरफ ऐसे देखता जैसे कुछ पढ़ता हुआ ( शायद कुछ ढूंढ रहा था ,कुछ अनकहा ,जो पढ़ सके )
उन दोनो के आपसी प्रेम मे किताबी प्रेम घूल कर पहाड़ों मे गुंजने लगा...प्रेम अक्सर सपने दिखाता है ..और एक अलग दुनिया में ले जाता है ..और तभी पेड़ों ने हवाओं को उनके चेहरे पर धकेल दिया.. दोनो सपने से बाहर थे ..
( कुछ तो था शायद उस वक्त जो अनकहा रह गया )

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