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एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है। दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं। राह क्यों मुड़ी थी? यात्री क्यों मिले थे? अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था, तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी? मैं अक्सर सोचती हूँ हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं? कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं। कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं। तुम शायद दूसरे लोगों में से थे। अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा? कौन पढ़ेगा? और अगर लिख भी दिया, तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है? मैं लिखूँ... पर क्या लिखूँ? कि तुम्हारे जाने के बाद शामों का रंग बदल गया था? कि बारिश अब भी होती है, लेकिन भीगने का मन नहीं करता? कि चाय आज भी दो कप बन जाती है, फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है? या यह लिखूँ कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया, बस कहना बंद कर दिया। कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं— धीरे-धीरे, चुपचाप। और फिर एक दिन मन के पुराने कुए...
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Moments
: - तुमने पूरी पुस्तक पढ़ ली?
:- हाँ बहुत अच्छी किताब थी..
:- अच्छा
:- हां पता है जब मै पढ़ रहा था मुझे हर वाकये पर तुम्हारा चेहरा झलक जाता..
खास करके जहाँ नायिका बादलों से कहती है, "ओ बादल तुम्हे ये आसमां कितना प्यारा
लगता है, ये दिन और ये रात, जैसे जिंदगी के ऊँच और नीच और क्या था वो..
:- जैसे बादलों में एक छोटा सा घर जैसे आसमां का छत , हो एक घर भी ..
और दोनो चुप हो जाते है , और लड़की की आंखें शर्म से झुक जाती है .. और लड़का उसके चेहरे की तरफ ऐसे देखता जैसे कुछ पढ़ता हुआ ( शायद कुछ ढूंढ रहा था ,कुछ अनकहा ,जो पढ़ सके )
उन दोनो के आपसी प्रेम मे किताबी प्रेम घूल कर पहाड़ों मे गुंजने लगा...प्रेम अक्सर सपने दिखाता है ..और एक अलग दुनिया में ले जाता है ..और तभी पेड़ों ने हवाओं को उनके चेहरे पर धकेल दिया.. दोनो सपने से बाहर थे ..
( कुछ तो था शायद उस वक्त जो अनकहा रह गया )

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