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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

बचपन के पन्नो से

 सबके अपने बचपन की कहानी के किस्से होते है लेकिन आशू उसका बचपन ? हम्म कैसा था उसका बचपन ? 

जब भी पीछे मुड़कर अतीत में झाक कर देखती हु टटोलती हूं अपने बचपन कहा है ? कुछ नही मिलता कुछ दर्द के सिवा बचपन था ही कहा उसका ?? शायद उम्र से पहले बड़े होने का अभिशाप मिला था आशू को नन्ही आशू जबसे कुछ समझ आया तब बस एक ही सवाल होता मां ऐसी क्यों है उसकी दूसरों की तो नही है ऐसी ... कभी उसे पास नही लेती हमेशा दुत्कार देती ..आशू ढूंढती रहती प्रेम को ममत्व को क्या ही चाहिए होता उसे प्रेम बस और कुछ भी तो नहीं .. 

बड़े होकर भी बस शायद उसने वही ढूंढा ..पता नहीं शायद कुछ आत्माएं शापित होती हैं और अब आशू खुद पत्थर हो गई ...


अब उसे खुद प्रेम से नफरत है बेहद नफरत ...!!

और उसकी संवेदनाएं जैसे मर गई है ..खुद को पाषाण बनते देख उसकी आत्मा भी मर गई शायद यही ठीक है यही 


नियति है ...!! 


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