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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

बाते

 क्या हो रहा है 

- कुछ नहीं! फिलहाल तो उम्र हो रही है

और बढ़ती उम्र के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ रही है !

सोचता हूं कितना अच्छा होता गर उम्र के साथ इतनी जिम्मेदारियां भी न बढ़ती .. इन जिम्मेदारियों के बोझ के तले ख्वाहिशें कहा दब गई पता नहीं चला ! अब इन ख्वाहिशों की जमी पर उम्मीदों के महल बनाया है जिसे बस सजाए जा रहे! 

- सही है कुछ तो हो रहा है

- हम्म! ऐसा कह सकते हैं

और क्या यह उम्मीदों का महल सुंदर नहीं लगता तुम्हें..?? 

- हम्म! अभी देखा जाए तो यही सुंदर है

- हह्ह्! कितना अजीब है ना इतना समय बीत गया 

  और हम इन उम्मीदों के महल को सजाने में व्यस्त थे 

  और समय के लगातार बीतने को कभी देख नहीं पाए.. इस महल के खुशियों को जीना भी भूल गए! 

- समय जब बीत रहा होता है हम उस पर ध्यान कहाँ देते हैं ...हम तो बस भागते रहते इन खुशियों के लम्हों में ठहरना आता कहा है .. खैर! 


आओ अब पास !!

: मुझे तुम्हारे साथ लम्हों में जीना अच्छा लगता है जानती हूं तुम्हारे पास वक्त नहीं होता .. मगर ये छोटे छोटे लम्हे खुशियां दे जाते है !

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