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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

बाते

 क्या हो रहा है 

- कुछ नहीं! फिलहाल तो उम्र हो रही है

और बढ़ती उम्र के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ रही है !

सोचता हूं कितना अच्छा होता गर उम्र के साथ इतनी जिम्मेदारियां भी न बढ़ती .. इन जिम्मेदारियों के बोझ के तले ख्वाहिशें कहा दब गई पता नहीं चला ! अब इन ख्वाहिशों की जमी पर उम्मीदों के महल बनाया है जिसे बस सजाए जा रहे! 

- सही है कुछ तो हो रहा है

- हम्म! ऐसा कह सकते हैं

और क्या यह उम्मीदों का महल सुंदर नहीं लगता तुम्हें..?? 

- हम्म! अभी देखा जाए तो यही सुंदर है

- हह्ह्! कितना अजीब है ना इतना समय बीत गया 

  और हम इन उम्मीदों के महल को सजाने में व्यस्त थे 

  और समय के लगातार बीतने को कभी देख नहीं पाए.. इस महल के खुशियों को जीना भी भूल गए! 

- समय जब बीत रहा होता है हम उस पर ध्यान कहाँ देते हैं ...हम तो बस भागते रहते इन खुशियों के लम्हों में ठहरना आता कहा है .. खैर! 


आओ अब पास !!

: मुझे तुम्हारे साथ लम्हों में जीना अच्छा लगता है जानती हूं तुम्हारे पास वक्त नहीं होता .. मगर ये छोटे छोटे लम्हे खुशियां दे जाते है !

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