Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Bashir badra

 हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए 


चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए 


कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए 


तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए 


अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आख़िर 


मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए 


समुंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दे हम को 


हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए 


मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा 


परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए 


उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो 


न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए 


बशीर बद्र

Comments

Popular Posts