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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

स्त्री

कई स्त्रियों को देखा है मैंने अपेक्षाओं के बोझ तले धस्तें हुए, उसके बोझ को समेट हुए अपने जीवन का लक्ष्य पूरा करते  हुए ..और बदले में और अपेक्षाओं की टोकरी या फिर अवहेलना से भरा बोरा पाते हुए..समाज में स्त्रियों के साथ व्यवहार करने के क्या दायरे है ये तय करना किसकी प्राथमिकता है; हम जैसे पितृतंत्र समाज की या फिर उन स्त्रियों की जो अपना स्वत: झोंक कर एक विश्व निर्माण करती है... और इस विश्व निर्माण में उनकी अवहेलना हम पुरुष ही नहीं अपितु वो स्त्रियां भी करती है जो एक दूसरी स्त्री को अपनी लाई हुई संपत्ति समझ उनके लिए हुए हर निर्णय पे अंकुश लगाती है...!!

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