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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

कुछ पन्ने डायरी के

ढलती दोपहर के साथ ही आंगन में लगी बेला मुझे पुकारने लगी, तनिक भी इच्छा नहीं थी उससे बतियाने की,

लेकिन इतना आसान कहां है मन की करना।


शाम के संग भी तुम्हारी स्मृतियां धूमिल होती जा रही थी और संग-संग मेरे बेचैनियों को उजागर कर रही थी,

लेकिन बेला कहां मानने वाली थी मुझे संग बिठा कर बिन पूछे ही अपने कुछ फूलों को चुन मेरे बालों में लगा दिया,

कितनी बार रोका मैने लेकिन इतना आसान कहां है मन की करना।


उसके फूलों से आती भीनी सुगंध मुझे तुम्हारे देह की गंध को भुलाने पर विवश कर रहे थे,

जो हर भोर मुझे किसी अप्सरा की भांति मुझे जगाने आ जाती है,

प्रयत्न तो बहुत किए मैंने उन्हे समेटने की लेकिन इतना आसान कहां है मन की करना।


उसकी डालियां मुझे आलिंगन में ले व्यक्त कर रही थी अपने दिन भर की थकान,

जो मुझे खींच रहे थे तुम्हारे आलिंगन की स्पष्टता की ओर,

अपितु उसकी निरंतर बकबक कहां बोध होने दे रही थी ,

लेकिन इतना आसान कहा है अपने मन की करना।


बेला हल्के से माथे को सहला कर मुझे अपनी बातों में लगा बहलाने का प्रयत्न कर रही थी,

लेकिन तुम किसी ज़िद्दी दाग़ की भाती मेरे ह्रदय में जा बैठे हो

स्वयं से अलग करना तो शिव के धनुष तोड़ने सा जान मालूम पड़ रहा था,

हालांकि इतना आसान कहां है मन की करना।


स्वयं भी तो अवगत हो ना तुम?? 

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