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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Self Talk

डेढ़ साल, एक अदद सफ़र,  एक कहानी जिसे आगे बढ़ने से पहले सौंप दिया वक़्त ने नयी कहानी को .. कितनी ही मुन्तशिर यादें समेटे जाने के इन्तेज़ार में बुढ़ाती जाती हैं और हम आगे बढ़ते हुए उन्हें छोड़ते चलते हैं.. 

पीछे मुड़ कर देखती हूँ तो लगता है मुझमें से ना जाने मेरे कितने हिस्से झर गये हैं पतझड़ की तरह, जितना समेट रही हूँ उतना ही हाथ से छिटक जाती हैं उनकी परछाइयाँ..ये डेढ़ साल इम्तेहान की तरह आए थे, कभी कभी लगा अब बस और शायद नही कर पाऊंगी .. फिर खुद से किए एक वादे को याद कर हम हर दूसरी सुबह हंसते  हंसते चले जाते थे सब कुछ फिर से शुरू करने , फिर उस दिन का इम्तिहान देने .. और आख़िर तक हम उस इम्तिहान में शायद पास नही हो पाए.. कभी  एहसास का इन्तेहान, कभी सब्र का इम्तेहान, कभी काबिलियत का इम्तेहान, आत्मसम्मान का इम्तेहान और सबसे बड़ा विश्वास का इम्तेहान.. जानती हूँ ज़िन्दगी के हाथों में एक-एक बाद इम्तेहान के पर्चे होते ही हैं, एक ख़त्म होता है तो दूजा पर्चा आगे कर देती है ज़िन्दगी.. पर कभी कभी हार जाती हूं और हमेशा की तरह भाग जाती हूं बहुत दूर इन इम्तिहानों से उस जगह कभी न वापस आने के लिए..और खुद को नए इम्तिहानों में झोंक देती हूं और भी कड़े ऐसी ही हूं मैं .. भागती दौड़ती रहती हूं ..अपने रिश्तों में मैं बहुत सारा यक़ीन जमा करती हूँ, प्रेम से कहीं ज़्यादा इसीलिए शायद मुझे टूटे हुए रिश्ते हद से ज़्यादा चुभते हैं, मैं भागती हूँ उनसे, उनकी परछाईयों से, उनके ज़िक्र भर से.. ज़िन्दगी उन टूटे हुए रिश्तों की मरम्मत तो नहीं करती पर उन टूटे हुए रिश्तों के टुकड़े दफ़नाने की कुछ जगह ज़रूर दे देती है.. 

कभी कभी सोचती हूं कब तक भागूंगी .. फिर याद आता है जो राम चाहेंगे वही होगा एक दिन कोई थमना सीखा देगा या थाम लेगा किसी एक जगह हमेशा के लिए!! 


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