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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

ठीक तुम्हारे पीछे - मानव कौल book review in my words

मानव कौल मेरे पसंदीदा  लेखकों मैं से एक है हाल में उनकी किताब "ठीक तुम्हारे पीछे" पढ़ी यह किताब  हमें एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जो हमारे भीतर के अनकहे भावनाओं और रिश्तों के उलझाव को बड़ी गहराई से छूती है..यह किताब उन छोटी-छोटी यादों, अनुभवों और घटनाओं का संग्रह है, जो किसी न किसी रूप में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं..!


कहानी में मानव ने बेहद सरल और सहज भाषा का प्रयोग किया है, जो पाठकों को सीधे उनके अनुभवों से जोड़ती है.. "ठीक तुम्हारे पीछे" में लेखक ने मानवीय रिश्तों की नाजुकता और उनके बदलते रूपों को दर्शाया है.. कहानी के पात्रों के माध्यम से जीवन की अस्थिरता, प्रेम की अधूरी संभावनाओं, और समय के साथ बदलते संबंधों को बहुत संवेदनशीलता के साथ उजागर किया गया है..!


मानव कौल की यह किताब एक आत्मविश्लेषण की यात्रा है.. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जो निर्णय लेते हैं, जो बातें अनकही रह जाती हैं, और जो भावनाएँ हम भीतर दबाकर रखते हैं, वे कैसे हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं..!


कहानी में गहराई के साथ एक नाज़ुक भावनात्मक प्रवाह है, जो हर पाठक को कहीं न कहीं छू जाता है.. "ठीक तुम्हारे पीछे" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि जीवन के कई अनसुने और अनछुए पहलुओं का प्रतिबिंब है..!!


यह किताब उन लोगों के लिए है जो जीवन की जटिलताओं और रिश्तों की परतों को समझने और महसूस करने की क्षमता रखते हैं...मानव कौल की यह रचना पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है, और पढ़ने के बाद एक ऐसी छाप छोड़ती है जो लंबे समय तक दिल में बसी रहती है..!

तुम्हें पा लेने की चाह में,

खुद को खोने का डर भी था,

पर इस सफर में,

मैं बस चलता रहा...

ठीक तुम्हारे पीछे..!!



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