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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

ठीक तुम्हारे पीछे - मानव कौल book review in my words

मानव कौल मेरे पसंदीदा  लेखकों मैं से एक है हाल में उनकी किताब "ठीक तुम्हारे पीछे" पढ़ी यह किताब  हमें एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है जो हमारे भीतर के अनकहे भावनाओं और रिश्तों के उलझाव को बड़ी गहराई से छूती है..यह किताब उन छोटी-छोटी यादों, अनुभवों और घटनाओं का संग्रह है, जो किसी न किसी रूप में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती हैं..!


कहानी में मानव ने बेहद सरल और सहज भाषा का प्रयोग किया है, जो पाठकों को सीधे उनके अनुभवों से जोड़ती है.. "ठीक तुम्हारे पीछे" में लेखक ने मानवीय रिश्तों की नाजुकता और उनके बदलते रूपों को दर्शाया है.. कहानी के पात्रों के माध्यम से जीवन की अस्थिरता, प्रेम की अधूरी संभावनाओं, और समय के साथ बदलते संबंधों को बहुत संवेदनशीलता के साथ उजागर किया गया है..!


मानव कौल की यह किताब एक आत्मविश्लेषण की यात्रा है.. यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम जो निर्णय लेते हैं, जो बातें अनकही रह जाती हैं, और जो भावनाएँ हम भीतर दबाकर रखते हैं, वे कैसे हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं..!


कहानी में गहराई के साथ एक नाज़ुक भावनात्मक प्रवाह है, जो हर पाठक को कहीं न कहीं छू जाता है.. "ठीक तुम्हारे पीछे" सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि जीवन के कई अनसुने और अनछुए पहलुओं का प्रतिबिंब है..!!


यह किताब उन लोगों के लिए है जो जीवन की जटिलताओं और रिश्तों की परतों को समझने और महसूस करने की क्षमता रखते हैं...मानव कौल की यह रचना पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है, और पढ़ने के बाद एक ऐसी छाप छोड़ती है जो लंबे समय तक दिल में बसी रहती है..!

तुम्हें पा लेने की चाह में,

खुद को खोने का डर भी था,

पर इस सफर में,

मैं बस चलता रहा...

ठीक तुम्हारे पीछे..!!



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