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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

वेड मन ....  

हे मन आज एकांतात
उगीचच रडत आहे,
तू माझ्या जवळ नाहीस
याची जाणीव छळत आहे.
कधी- कधी ....
तूझं ते माझ्यावर रागावणं,
आणि मी रागावले तर झटक्यात मला मनवणं,
ती एक-एक आठवण, मनाला आज सलत आहे,
तू माझ्या जवळ नाहीस
याची जाणीव छळत आहे.
कधी-कधी ....
तूझं ते मला भेटण्यासाठी बोलावणं,
आणि मी "नाही" म्हणताच, अल्लडपणे हट्ट धरणं,
तूजा तो हट्ट आजही माझ्या स्मरणात आहे,
तू माझ्या जवळ नाहीस
याची जाणीव छळत आहे.
कधी- कधी ....
तूझं ते माझ्यासाठी वाट पाहणं,
मी उशिरा आले कि माझ्यावर ओरडणं,
पण माझ्या एका .....,sorry मुळे
तूझा तो राग "स्मित हास्यात" विरून जाणं,
आजही ते हसू माझ्या आठवणीत आहे,
तू माझ्या जवळ नाहीस
याची जाणीव छळत आहे.
खरंच ...........
हे मन आज एकांतात
उगीचच रडत आहे,
तू माझ्या जवळ नाहीस
याची जाणीव छळत आहे.

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