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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

माँ.......एक सुंदर कथा

लघु कथा
*********
एक छोटे बालक को आम का पेड बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो तुरंत आम के पेड के पास पहुंच जाता। पेड के उपर चढना, आम खाना और खेलते हुए थक जाने पर आम की छाया मे ही सो जाना,यही उसका रोज का काम था। बालक और उस पेड के बीच एक अनोखा संबंध बंध गया था।
बच्चा जैसे जैसे बडा होता गया वैसे वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया। कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया। आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता रहता।
एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी और आते देखा। आम का पेड खुश हो गया।
बालक जैसे ही पास आया तुरंत पेड ने कहा, "तू कहां चला गया था? मै रोज़ तुम्हे याद किया करता था। चलो आज दोनो खेलते है।"
बच्चा अब बडा हो चुका था, उसने आम के पेड से कहा, "अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है,
पर मेरे पास फीस भरने के लिए पैसे नही है।"
पेड ने कहा, "तू मेरे आम लेकर बाजार मे जा और बेच दे,इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"
उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम उतार लिए, पेड़ ने भी ख़ुशी ख़ुशी दे दिए,और वो बालक उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।
उसके बाद फिर कभी वो दिखाई नही दिया।आम का पेड उसकी राह देखता रहता।
एक दिन अचानक फिर वो आया और कहा, "अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मेरा संसार तो चल रहा है पर मुझे मेरा अपना घर बनाना है इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"
आम के पेड ने कहा, " तू चिंता मत कर अभी मैं हूँ न,
तुम मेरी सभी डाली को काट कर ले जाओ , उससे अपना घर बना लो ।"
उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।
अब आम के पेड के पास कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसके सामने भी नही देखता था। पेड ने भी अब वो बालक/ जवान उसके पास फिर आयेगा यह आशा छोड दी थी।
फिर एक दिन एक वृद्ध वहां आया। उसने आम के पेड से कहा,"तुमने मुझे नही पहचाना, पर मै वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप उसे हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"
आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा, "पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुझे दे सकूं...।"
वृद्ध ने आंखो मे आंसु के साथ कहा,"आज मै कुछ लेने नही आया हूं, आज तो मुझे तुम्हारे साथ जी भरके खेलना है, तुम्हारी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"
इतना कह कर वो रोते रोते आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सूखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।
वह वृक्ष हमारे माता-पिता समान है, जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था ।
जैसे जैसे बडे होते गये उनसे दूर होते गये।
पास तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई।
आज भी वे माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।
आओ
हम जाकर उनको लिपटे ...
उनके गले लग जाये ...
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जिससे उनकी वृद्धावस्था फिर से अंकुरित हो जाये।

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