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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

धर्म....!!

कुरुक्षेत्राला'धर्मक्षेत्र' असे संबोधून महर्षी व्यासांनी काही कोडी सोडवली तर काही निर्माण केली दररोज सूयोर्दयाला शंखनाद करून युद्ध सुरू व्हायचे आणि सूर्यास्ताला शंखनादानेच संपायचे युद्ध सुरू होण्यापूवी त्याचे नियम दोन्ही पक्षांनी एकत्र बसून ठरवले होते  त्यांचे पालन झालेच असे नाही...त्यांनी कुरुक्षेत्राला धर्मक्षेत्र मानले व ती धर्मयुद्धाची रंगभूमी बनवली.भारतीय युद्धात कौरव आणि पांडव या दोघांनीही अनेकदा युद्धनीतीचा भंग केला कौरवांनी अभिमन्यूला कपट करून ठार मारले; तर अर्जुनाने रथातून उतरलेल्या व हाती शस्त्र नसलेल्या महारथी कर्णावर बाण सोडला..'नरो वा कुंजरो वा' अशी हेतुपुरस्सर संदिग्धता ठेवून दोणांचा तेजोभंग करण्यास स्वत: धर्मराज युधिष्ठिर कचरले नाहीत तरीही व्यासांनी पांडवांचा पक्ष धर्माचा मानला.याचे कारण त्यांचा अंतिम सत्यावर विश्वास होता... ?

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