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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

धर्म....!!

कुरुक्षेत्राला'धर्मक्षेत्र' असे संबोधून महर्षी व्यासांनी काही कोडी सोडवली तर काही निर्माण केली दररोज सूयोर्दयाला शंखनाद करून युद्ध सुरू व्हायचे आणि सूर्यास्ताला शंखनादानेच संपायचे युद्ध सुरू होण्यापूवी त्याचे नियम दोन्ही पक्षांनी एकत्र बसून ठरवले होते  त्यांचे पालन झालेच असे नाही...त्यांनी कुरुक्षेत्राला धर्मक्षेत्र मानले व ती धर्मयुद्धाची रंगभूमी बनवली.भारतीय युद्धात कौरव आणि पांडव या दोघांनीही अनेकदा युद्धनीतीचा भंग केला कौरवांनी अभिमन्यूला कपट करून ठार मारले; तर अर्जुनाने रथातून उतरलेल्या व हाती शस्त्र नसलेल्या महारथी कर्णावर बाण सोडला..'नरो वा कुंजरो वा' अशी हेतुपुरस्सर संदिग्धता ठेवून दोणांचा तेजोभंग करण्यास स्वत: धर्मराज युधिष्ठिर कचरले नाहीत तरीही व्यासांनी पांडवांचा पक्ष धर्माचा मानला.याचे कारण त्यांचा अंतिम सत्यावर विश्वास होता... ?

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