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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

ISHQ ......

तुझे cigarette फूँकने वाले लोग पसंद हैं क्या? Cigarette का एक कश ओढकर, अचानक उसने पूँछा!
हम्म!अब किसी को पसंद या नापसंद करने का फ़ैसला,महज एक cigarette तो नहीं कर सकती!" एक गहरी साँस छोड़ते हुए इसने जवाब दिया!
"अरे?लेकिन cigarette पीना तो बुरी बात हैं ना?"
ज़रा सा चौक कर उसने फिर सवाल किया!
"cigarette" पीना बुरा नहीं,
 "cigarette" पीना "हानिकारक" है!उसकी आँखों में देखते हुए, इसनेे फिर जवाब दिया! अच्छा ?तो क्या फर्क हैं, बुरा न होने में और हानिकारक होने में?
"Cigarette को पैर से कुचलते हुए उसने फिर पूँछा ..
"वहीं.... जो इश्क और आदत में हैं!!
मुस्कराकर इसने जवाब दिया!!

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