Skip to main content

Featured

Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Aksar sochti hu....

अक्सर...
यूँ ही सोचती हूं
तुम क्या हो ?

तुम कभी कभी उस महासागर की तरह लगते हो जो सब कुछ अपने अन्दर समाए बैठा है 

या तुम मुझे कभी कभी
दिन भर की थकान को तिरोहित कर
सुकून के पलों का आरम्भ करती
सुरमई शाम से लगते हो ..

नहीं
मै तुम्हारे व्यक्तित्व को निश्चित अर्थों में 
बांधना नहीं चाहती

तुम उस किताब की तरह हो

जिसके पावन श्लोक में छुपाए हुए हैं
लोक लोकाचार के अनेकों रहस्य
पवित्र सूक्तियां समाहित किये हैं
सुख,समृद्धता के अर्थ

हाँ तुम उस किताब की तरह हो,
जिसका अध्ययन कभी पूर्ण नही हो सकता...!!




Comments

Popular Posts