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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Evening...

मुझे अक्सर ढलती शाम को देखना पसंद है । ये शामे मेरे हमेशा करीब रही है । कभी उदासी तो कभी गुलाल बिखेर देती शाम .. शाम जिसे सुनके सब उससे कहते ये तो उदासी का पूरक है,मतलब ढलता हुआ सूरज ढलता हुआ दिन,पर जिंदगी को देखने का उसका अपना ही नजरिया है,

कभी कभी मुझे लगता है शाम उदासी का नहीं बल्कि शक्ति का पूरक है,जो सूरज पूरा दिन अपनी ऊर्जा से लोगों के जीवन को रोशन करता है,उस उगते हुए सूरज की प्रशंसा सब करते हैं। पर उस ढलते सूरज का साथ देने की शक्ति सिर्फ शाम में होती है,जो उस उदास थके हारे सूरज  को बाँहें फैला कर अपने आगोश में भर लेती है,और नई ऊर्जा से भर देती है कि वो आने वाली सुबह में फिर चमक सके और तेज, 

शाम वो है जिसकी गोद में सर रख के सूरज भी सुकून पाता है,वो वक़्त जो दिन और रात को मिलाने में सहभागी है,और जिसे पवित्र समय माना जाता है भगवान की आरती और अजान पढ़ी जाती है,तो शाम उदासी का पूरक कैसे हो सकती है....!!

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