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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Intezar..

मुझे इंतज़ार करना अच्छा लगता है तुम्हारा, तुम्हारे फ़ोन का, तुम्हारी एक झलक पाने के लिए हम चाहते है की दिन की पहली सेल्फ़ी भेजो, जिसमें तुम अलसाए से दिखते हो और जिसे देख कर मेरी सुबहें ख़ुशनुमा सी हो जाए
मुझे इंतज़ार रहता है, तुम्हारे पहले मैसेज का जिसमें आँखों में दिल उगाए एक स्माइली रहता है, जो कभी दोपहर तो कभी शाम को मेरा 'गुड मॉर्निंग' लाता है।

मुझे इंतज़ार रहता है उस पहली आवाज़ का जो कभी शाम, तो कभी दिन ढले आती है, जब मीलों दूर बैठे तुम छू लेते हो।
और तुम्हारी आवाज़ का एक टुकड़ा हवा में नहीं खोता वो वहीं, कानों के आस-पास गर्दन पर शायद रह जाता है।

ये मेरा इंतज़ार सिर्फ़ मेरा है। इसके हर लम्हें पर सिर्फ़ मेरा हक़ है। इन लम्हों में जो तुम होते हो वो सिर्फ़ मेरे होते हो।
इन इंतज़ार के पलों में तुम,तुम नहीं होते तुम वो होते हो, जिसे मैं बनाती हूँ, अपने इंतज़ार से, अपने इश्क़ से,अपनी कल्पनाओं से!


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