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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

ढलती उम्र...

अजी सुनते हो, चाय बन गयी है, जरा ले तो जाना ”

“मुझसे कहा क्या?”

“हाँ, चाय बन गयी है |”

“अच्छा, आया |”

कहते हुए उसने अपने काँपते हाथों से कुर्सी के हत्ते का सहारा लिया और धीरे से उठ खड़ा हुआ
एक दर्द भरी कराह के साथ, संतुलन बनाते हुए, वह रसोईघर की ओर बढ़ चला

वहाँ पहुँचकर प्लेटफार्म पर रखे चाय के प्याले को उठाया था कि काँपते हाथों के साथ प्याले के अंदर की चाय भी वृद्धावस्था के हिलोरे मारने लगीं उसके काँपते हाथों को देखकर पत्नी व्याकुल हो उठी,हे भगवान ये क्या तुम्हारा हाथ तो रोज से भी ज्यादा काँप रहा है,आज दवा नहीं खाई
“दवा भी कब तक साथ देगी बुढ़ापे का? सोचो न ..कहते हुए, वह मुड़कर डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ चला | पत्नी भी धीरे से उठकर, छड़ी के सहारे से ठक-ठक करती हुई, डाइनिंग टेबल के पास पड़ी कुर्सी पर धम्म से जा बैठी | साँस जोर-जोर से फूल रही थी .मगर खुद को सम्हालते हुए बोली,
सुनो  ,सुनते हो..उसे सुनाई नहीं दिया
अरे सुनते हो ...“कुछ मुझसे कहा क्या?”

“हाँ बाबा हाँ | कान में मशीन नहीं लगाई है क्या?”

“लगाई है न "
 न जाने ... इस संध्या-बेला में ... कैसे हमारा एक-एक पल कटेगा | बहुत मुश्किल है ... कोई आस नहीं दिखाई देती |
न जाने क्यों मित्र, अड़ोसी-पड़ोसी और रिश्तेदार सभी अब हमसे कन्नी काटने लगे हैं | कितना बदसूरत होता है बुढापा |”

“देखो प्लीज, निराशावादी बातें न किया करो, मेरा जी घबराने लगता है | मैं हूँ न,तुम्हारे साथ !

“हाँ  तुम ठीक कहती हो | अच्छा. एक काम करना, मेरे लिए रोटी मत बनाना |”

“क्यों?”

“मेरे मसूड़े बहुत दुखते हैं, रोटी चबाते में | केवल दलिया बना लेना

“हूँ तो अब झूठ बोलना भी कोई तुमसे सीखे, क्या मैं नहीं जानती कि दूध में भिगोई रोटी खाए बिना,तुम्हारा मन नहीं भरता जब से खाना बनाने वाली गयी है,तुम्हारे यही बहाने चल रहे हैं,
जिससे मुझे कोई काम न करना पड़े और मैं आराम करूँ |”

“वाह जी वाह ! तुम भी क्या बात करते हो ! सच की बुनियाद पर तो हमने अपना जीवन खड़ा किया, बच्चों को हमेशा अच्छी शिक्षा दी | अब ढलती उम्र में ... बुझते दिए की रौशनी में मुझे पाठ सिखा रहे हो !
वातावरण में अजीब सी निस्तब्धता छा गयी  मानो कमरे की दीवारों पर भी उदासी छा गयी थी तभी बाहर से कौवे की काँव-काँव सुनाई दी  वह चिहुँक उठी,“जरा देखो तो हमारी मुंडेर पर कौवा बोल रहा है

सुनकर उसकी आँखें भी चमक उठीं, मगर एकदम से बुझ भी गईं वह बोला,कौन आयेगा हमारे यहाँ जरा बताना तो?
“हाँ तुम ठीक कहते हो बच्चे सात समुन्दर पार हैं बहुत व्यस्त हैं जब यहाँ सुबह होती है,तो वहाँ रात होती है समय निकालकर हमसे बात कर लेते हैं,समझो यही हमारा भाग्य हैं

हाँ तुम ठीक कहती हो,यही हमारा भाग्य है, वो जहाँ भी रहें,सदा सुखी रहें अब आयेगा तो सिर्फ यमराज ही आएगा..
.“हाँ, तुम ठीक कहती हो,अब यमराज ही आएगा |”

“जाने के पहले ...ईश्वर से एक प्रार्थना जरूर करूँगी ..कहूँगी ..उसका गला रुंध गया और आँखें नम हो आईं

“क्या कहोगी?”

“कहूँगी .अगले जनम मुझे, नहीं-नहीं कहूँगी अगले जनम हमें कुछ भी देना,लेकिन लम्बी उमर न देना..!!

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