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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

वो ...

उसने बहुत स्त्रियों से प्रेम किया था

उसने हर स्त्री के अधरों पर अलग-अलग तरह से चुम्बन किया था उसने गौर की यह बात कि सब ही स्त्रियों ने तब
आंख बंद कर ली थी...

उसने सब ही स्त्रियों के उभार छुए कराह उठी स्त्री की कराहट से उसने अपने भीतर जोश भरा ..


उसने नाभियों को छुआ तो गौर किया कि हर देह , हर बार कांप गई थी उसने नही देखा कि उसकी आंखों में तब
लाल डोरियां तैरने लगी थीं..

स्त्री आकाश को भीतर भर रही थी जब
वह उभारों के किसी द्वीप पर अपनी धुन में दौड़ रहा था, हांफ रहा था..


सभी स्त्रियों ने आकाश को आलिंगन में भर
कस लिया था तब ठंडी आह भरी थी
और उसकी खुली आँखों मे आंखे डालकर बोली थीं
मुझे छोड़ कर मत जाना..

हर बार उसने तब सीने पर हाथ फिराया था
हर बार वह तब कुछ जीत लेने के भाव से भर उठा था
हर बार वह तब स्त्री के अस्तित्व से जुड़ रहा था
उसका भ्रम था के हर बार वह तब स्त्री को जीत लेने के बेहद करीब था

पर हर बार वह स्त्री को  हार गया जब भी उसने
सीने पर हाथ फिराया

 क्यूंकि उसने

हर बार देह को पाया स्त्री को नहीं  ....!!

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