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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

वो ...

उसने बहुत स्त्रियों से प्रेम किया था

उसने हर स्त्री के अधरों पर अलग-अलग तरह से चुम्बन किया था उसने गौर की यह बात कि सब ही स्त्रियों ने तब
आंख बंद कर ली थी...

उसने सब ही स्त्रियों के उभार छुए कराह उठी स्त्री की कराहट से उसने अपने भीतर जोश भरा ..


उसने नाभियों को छुआ तो गौर किया कि हर देह , हर बार कांप गई थी उसने नही देखा कि उसकी आंखों में तब
लाल डोरियां तैरने लगी थीं..

स्त्री आकाश को भीतर भर रही थी जब
वह उभारों के किसी द्वीप पर अपनी धुन में दौड़ रहा था, हांफ रहा था..


सभी स्त्रियों ने आकाश को आलिंगन में भर
कस लिया था तब ठंडी आह भरी थी
और उसकी खुली आँखों मे आंखे डालकर बोली थीं
मुझे छोड़ कर मत जाना..

हर बार उसने तब सीने पर हाथ फिराया था
हर बार वह तब कुछ जीत लेने के भाव से भर उठा था
हर बार वह तब स्त्री के अस्तित्व से जुड़ रहा था
उसका भ्रम था के हर बार वह तब स्त्री को जीत लेने के बेहद करीब था

पर हर बार वह स्त्री को  हार गया जब भी उसने
सीने पर हाथ फिराया

 क्यूंकि उसने

हर बार देह को पाया स्त्री को नहीं  ....!!

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