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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Dream

शहर के कोलाहल से दूर...नीरवता में गंगा की लहरों की आवाज़ सुनना चाहती हूं... मैं तुम्हारे सीने पर अपना सर रख उन लहरों के संगीत के साथ तुम्हारी धड़कन का संगीत सुनना चाहती हू .. उन धड़कनों में गूंजता मेरा नाम ..

और तुम खोए हुए अपनी सिगरेट के साथ ..तुम्हारे सिगरेट का वो धुआ मुझे किसी सुबह के यज्ञ के धूनी की तरह लगता है ... यज्ञ जो हमारे प्यार का है ...उस यज्ञ से पृथक हुई तुम्हारी जटिलता, तुम्हारा मौन, तुम्हारी गहराई ,तुम्हारे हृदय
की रिक्तता मैं सब अपने पास रख लेना चाहती हूं ...

तुम्हारा हाथ थामे सूरज को उगते हुए देखना चाहती हूं...चिड़ियों के कलरव के संग गुनगुना चाहती हूं कोई राग...
सर्दी की किसी सुबह... कुल्हड़ से सुरुक -सुरुक कर पीना चाहती हूं तुम्हारी जूठी मलाई वाली चाय के चंद घूंट....
एक ही शॉल में लपेटना चाहती हूं ख़ुद को तुम्हारे साथ...
भोर की लालिमा में पा लेना चाहती हूं तुम्हारी समग्रता को ....

जी लेना चाहती हूँ एक पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारे जैसी  बनकर
एक छोटा सा लम्हा...
जिसमें हो सिर्फ तुम और में ...!!


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