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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Dream

शहर के कोलाहल से दूर...नीरवता में गंगा की लहरों की आवाज़ सुनना चाहती हूं... मैं तुम्हारे सीने पर अपना सर रख उन लहरों के संगीत के साथ तुम्हारी धड़कन का संगीत सुनना चाहती हू .. उन धड़कनों में गूंजता मेरा नाम ..

और तुम खोए हुए अपनी सिगरेट के साथ ..तुम्हारे सिगरेट का वो धुआ मुझे किसी सुबह के यज्ञ के धूनी की तरह लगता है ... यज्ञ जो हमारे प्यार का है ...उस यज्ञ से पृथक हुई तुम्हारी जटिलता, तुम्हारा मौन, तुम्हारी गहराई ,तुम्हारे हृदय
की रिक्तता मैं सब अपने पास रख लेना चाहती हूं ...

तुम्हारा हाथ थामे सूरज को उगते हुए देखना चाहती हूं...चिड़ियों के कलरव के संग गुनगुना चाहती हूं कोई राग...
सर्दी की किसी सुबह... कुल्हड़ से सुरुक -सुरुक कर पीना चाहती हूं तुम्हारी जूठी मलाई वाली चाय के चंद घूंट....
एक ही शॉल में लपेटना चाहती हूं ख़ुद को तुम्हारे साथ...
भोर की लालिमा में पा लेना चाहती हूं तुम्हारी समग्रता को ....

जी लेना चाहती हूँ एक पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारे जैसी  बनकर
एक छोटा सा लम्हा...
जिसमें हो सिर्फ तुम और में ...!!


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