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Writing

 मैंने अब धीरे-धीरे सीख लिया है या यूं कहूँ की कोई सिखा कर गया ..कि ज़िंदगी हर किसी को अपनी मुट्ठी में क़ैद कर लेने का नाम नहीं,बल्कि वक़्त आने पर मुस्कुराकर रुख़्सत कर देने का हुनर है..पहले मैं बहुत रोकती थी लोगों को भी,रिश्तों को भी,यहाँ तक कि उन लम्हों को भी जो मेरी उँगलियों से फिसल चुके थे..फिर एक दिन समझ आया,मोहब्बत का मतलब किसी को थामे रखना नहीं, बल्कि उसके हिस्से की आज़ादी को भी उतनी ही शिद्दत से चाहना है अब जो चला जाता है, उसे बद्दुआ नहीं देती, सिर्फ़ अपनी दुआओँ से आहिस्ता-आहिस्ता विदा कर देती हूँ हाँ, दर्द अब भी होता है, आँखें आज भी भर आती हैं,मगर मैंने अपने आँसुओं से भी कह दिया है हर बिछड़ना मातम नहीं होता..मैंने सीखा है...कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा रहने नहीं, हमें बदलने आते हैं... और जब उनका काम पूरा हो जाता है, तो उन्हें रोक लेना अपने ही हिस्से की रौशनी से इंकार करना होता है..अब मैं जाने देने से नहीं डरती...क्योंकि मुझे यक़ीन है जो मेरी नसीब में लिखा है,वो मुझसे कभी जुदा नहीं होगा बाक़ी सब... वक़्त की अमानत है, और अमानतें एक दिन लौटा दी जाती हैं.. हमे भी वक्त को सब...

Death ....

कल एक सपना देखा मृत्यु बैठी थी घुटने मोड़े मेरे प्राणहीन देह के सिरहाने और उसके बगल में मैं भी बैठी थी घुटने मोड़े उसके साये का हाथ थामे....दोनों देख रहे थे इस देह के साथ किये जाने वाले तमाम प्रपंचों को..चीख़ते रुदन, कानों में राम नाम का पाठ, गंगा जल और तुलसी दल का रखा जाना उन सूखे होठों पर, पाँव के पास जलता-महकता लोबान, सिरहाने रखा तेल का दीपक, जिसकी बाती स्थिर थी, जैसे निश्चिंत हो कोई किसी कार्य सिद्धि के बाद.....तभी किसी ने छू कर कहा "बच्ची की देह अभी भी गर्म है"....माँ को देखा वो चूम रही थी माथा बार-बार, दोहरा रही थी कि "लौट के आना बिटिया"...कुछ पढ़ रहे थे कसीदें, कुछ कह रहे थे कि बाबाजी ने कहा था कि "आपकी इस बेटी की आयु बहुत कम है"...पर मुझे ध्यान आया उस नवजात बच्चे का जिसे एक रोज़ ऑटो में देखा था अपने सामने दम तोड़ते हुए, उससे तो कहीं अधिक जिया था मैंने....
पर कोई और भी था उस ख़ाली कमरे के दूसरे कोने में जो निहार रहा था मेरी मृत देह का चेहरा एक टक, एक आसूँ का कण भी उसकी आँखों में नहीं था, उसके चेहरे पर भी वही शून्यता थी जो मेरे मृत चेहरे पर थी...जैसे किसी मूर्तिकार ने पत्थर को तराश के गढ़ दी हो किसी सजीले युवक की मूर्ति....मैं जानती थी शायद उसे, मेरा कोई था वो शायद , उसने एक बार भी मेरी मृत देह से प्रश्न क्यों नहीं किया मेरे इतनी जल्दी जाने को ले कर, वो पूछता तो शायद एक क्षण को मैं मृत्यु से निवेदन करती पुनः मेरे जीवन को मेरी इस नश्वर देह को सौंपने के लिए, किंतु उसकी आँखों में कोई प्रश्न, कोई विषाद नहीं था, जैसे वो आया ही था विदा करने मुझे... कितनी अजीब बात है ना तुम्हारे साथ के लिए मैंने जब जिंदा थी तब संघर्ष किया और आज तुम मुझे विदा करने आए हुए थे .. सोचती हूं काश तुम तब मेरे साथ होते तो क्या मेरी देह इस तरह पड़ी होती .. नहीं शायद वो तुम्हारे बांहों के आगोश में कुछ नए सपने देख रही होती शायद .. पता नहीं .. पर हां तुम्हारे कुछ पल का साथ पाने के लिए मुझे मृत्यु को गले लगाना पड़ा ...
पर क्या अब मेरे  वो सपने जो मैंने तुम्हारे साथ के लिए देखे थे उनका कोई मतलब रहा नहीं .. मृत्यु आपको सारे बंधनों से मुक्ति तो देती ही है ...साथ में आपके सपने इच्छा आकांक्षा से भी मुक्त कर देती है .. मैंने अपने देह को पूर्णता भस्म होते देखा ..
गंगा में विलीन होते देखा ... मृत्यु को गले लगाए हुए स्वयं को सदा के लिए सोते देखा .. कभी एक सपना देखा था तुम्हारी बांहों में सोने का उस सपने को

गंगा में विलीन होते देखा ....!!

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