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मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

Death ....

कल एक सपना देखा मृत्यु बैठी थी घुटने मोड़े मेरे प्राणहीन देह के सिरहाने और उसके बगल में मैं भी बैठी थी घुटने मोड़े उसके साये का हाथ थामे....दोनों देख रहे थे इस देह के साथ किये जाने वाले तमाम प्रपंचों को..चीख़ते रुदन, कानों में राम नाम का पाठ, गंगा जल और तुलसी दल का रखा जाना उन सूखे होठों पर, पाँव के पास जलता-महकता लोबान, सिरहाने रखा तेल का दीपक, जिसकी बाती स्थिर थी, जैसे निश्चिंत हो कोई किसी कार्य सिद्धि के बाद.....तभी किसी ने छू कर कहा "बच्ची की देह अभी भी गर्म है"....माँ को देखा वो चूम रही थी माथा बार-बार, दोहरा रही थी कि "लौट के आना बिटिया"...कुछ पढ़ रहे थे कसीदें, कुछ कह रहे थे कि बाबाजी ने कहा था कि "आपकी इस बेटी की आयु बहुत कम है"...पर मुझे ध्यान आया उस नवजात बच्चे का जिसे एक रोज़ ऑटो में देखा था अपने सामने दम तोड़ते हुए, उससे तो कहीं अधिक जिया था मैंने....
पर कोई और भी था उस ख़ाली कमरे के दूसरे कोने में जो निहार रहा था मेरी मृत देह का चेहरा एक टक, एक आसूँ का कण भी उसकी आँखों में नहीं था, उसके चेहरे पर भी वही शून्यता थी जो मेरे मृत चेहरे पर थी...जैसे किसी मूर्तिकार ने पत्थर को तराश के गढ़ दी हो किसी सजीले युवक की मूर्ति....मैं जानती थी शायद उसे, मेरा कोई था वो शायद , उसने एक बार भी मेरी मृत देह से प्रश्न क्यों नहीं किया मेरे इतनी जल्दी जाने को ले कर, वो पूछता तो शायद एक क्षण को मैं मृत्यु से निवेदन करती पुनः मेरे जीवन को मेरी इस नश्वर देह को सौंपने के लिए, किंतु उसकी आँखों में कोई प्रश्न, कोई विषाद नहीं था, जैसे वो आया ही था विदा करने मुझे... कितनी अजीब बात है ना तुम्हारे साथ के लिए मैंने जब जिंदा थी तब संघर्ष किया और आज तुम मुझे विदा करने आए हुए थे .. सोचती हूं काश तुम तब मेरे साथ होते तो क्या मेरी देह इस तरह पड़ी होती .. नहीं शायद वो तुम्हारे बांहों के आगोश में कुछ नए सपने देख रही होती शायद .. पता नहीं .. पर हां तुम्हारे कुछ पल का साथ पाने के लिए मुझे मृत्यु को गले लगाना पड़ा ...
पर क्या अब मेरे  वो सपने जो मैंने तुम्हारे साथ के लिए देखे थे उनका कोई मतलब रहा नहीं .. मृत्यु आपको सारे बंधनों से मुक्ति तो देती ही है ...साथ में आपके सपने इच्छा आकांक्षा से भी मुक्त कर देती है .. मैंने अपने देह को पूर्णता भस्म होते देखा ..
गंगा में विलीन होते देखा ... मृत्यु को गले लगाए हुए स्वयं को सदा के लिए सोते देखा .. कभी एक सपना देखा था तुम्हारी बांहों में सोने का उस सपने को

गंगा में विलीन होते देखा ....!!

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