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जो कहा नहीं गया..

एक अजीब-सी चुभती ख़ामोशी भर आई है। दीवारों पर जैसे हज़ारों सवाल उग आए हैं। राह क्यों मुड़ी थी? यात्री क्यों मिले थे? अगर अंततः अलग-अलग दिशाओं में ही चले जाना था, तो फिर एक-दूसरे के हिस्से की धूप बनने की ज़रूरत क्या थी? मैं अक्सर सोचती हूँ हर मुलाक़ात का कोई अर्थ होता भी है, या हम बाद में अर्थ गढ़ लेते हैं? कुछ लोग आते हैं और जीवन में घर बना लेते हैं। कुछ लोग आते हैं और सिर्फ़ एक खाली कमरा छोड़ जाते हैं। तुम शायद दूसरे लोगों में से थे। अब इस यात्रा-वृत्तांत को कौन लिखेगा? कौन पढ़ेगा? और अगर लिख भी दिया, तो क्या शब्द उन जगहों तक पहुँच पाएँगे जहाँ दर्द बिना भाषा के रहता है? मैं लिखूँ... पर क्या लिखूँ? कि तुम्हारे जाने के बाद शामों का रंग बदल गया था? कि बारिश अब भी होती है, लेकिन भीगने का मन नहीं करता? कि चाय आज भी दो कप बन जाती है, फिर एक कप देर तक ठंडा होता रहता है? या यह लिखूँ कि तुम्हारे जाने के बाद मैंने बोलना कम नहीं किया, बस कहना बंद कर दिया। कुछ दुःख ऐसे होते हैं जिन्हें आँसू भी व्यक्त नहीं कर पाते। वे भीतर काई की तरह जमने लगते हैं— धीरे-धीरे, चुपचाप। और फिर एक दिन मन के पुराने कुए...

My Love ❤️❤️

मुझे प्रेम में पास होने से ज़्यादा साथ होना ज़्यादा श्रेयस्कर लगता है, ठीक जैसे आप मेरे साथ प्रेम बन कर रहते हो, ठीक उसी तरह मैंने चुना आपकी देह के साथ परछाई की तरह रहना, जो आपके जीवन की हर सम-विषम परिस्थितियों में आपके साथ दृढ़ता से आपके पीछे हूँ..मेरी आंखे आईना है आपके प्रेम का,और आपका प्रेम मेरे लिए अस्तित्व की नींव भी.. जीवन के सारे दिन मिल कर भी हमारे प्रेम को शायद ही किसी सही परिधि में बांध भी पाएं..

जानती हूं हम दोनों किसी नदी की किनारे की तरह है पर हम हमेशा साथ चलेंगे सागर से मिलने तक..चलोगे ना ?

मेरी सारी रचनाएँ आपको अर्पण किये गए रक्तिम पलाश की तरह हैं, ठीक जैसे शिव जी को चढ़ाया जाता है बिना दोष वाला

त्रिपत्री बेलपत्र...!!


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