Skip to main content

Featured

मन की गाँठें

मन की गाँठें रस्सी की गाँठों जैसी नहीं होतीं कि उन्हें हाथों से पकड़कर खोल लिया जाए। वे दिखाई भी नहीं देतीं, फिर भी उनका बोझ कंधों पर रखा किसी अदृश्य पत्थर की तरह हर समय हमारे साथ चलता रहता है। ये गाँठें अचानक नहीं बनतीं। इन्हें बनने में वर्षों लग जाते हैं। कभी किसी अधूरे संवाद से, जब हम बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए। कभी किसी टूटे हुए विश्वास से, जब किसी अपने ने वही किया जिसकी उम्मीद हमने कभी नहीं की थी। कभी किसी बिछड़न से, जो बाहर से साधारण दिखती है लेकिन भीतर किसी पूरे संसार को उजाड़ देती है। और कभी उन भावनाओं से जिन्हें हम व्यक्त नहीं कर पाते, क्योंकि हमें डर होता है कि कहीं हमारी संवेदनशीलता हमारी कमजोरी न समझ ली जाए। समय के बारे में कहा जाता है कि वह हर घाव भर देता है। शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। समय कई बार घावों को भरता नहीं, बस उनके ऊपर धूल जमा देता है। हम जीना सीख लेते हैं। हम मुस्कुराना सीख लेते हैं। हम लोगों से मिलते हैं, काम करते हैं, यात्राएँ करते हैं, नई कहानियाँ लिखते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखता है। इतना सामान्य कि दुनिया को लगता है कि हम पूरी तरह ठीक हैं। ले...

खरा तो एकची धर्म जगाला प्रेम अर्पावे

 खरा तो एकची धर्म

जगाला प्रेम अर्पावे

जगी जे हीन अतिपतित
जगी जे दीन पददलित
तया जाऊन उठवावे

जयांना कोणी ना जगती
सदा ते अंतरी रडती
तया जाऊन सुखवावे

समस्तां धीर तो द्यावा
सुखाचा शब्द बोलावा
अनाथा साह्य ते द्यावे

सदा ते आर्त अतिविकल
जयांना गांजती सकल
तया जाऊन हसवावे

कुणा ना व्यर्थ शिणवावे
कुणा ना व्यर्थ हिणवावे
समस्तां बंधु मानावे

प्रभूची लेकरे सारी
तयाला सर्वही प्यारी
कुणा ना तुच्छ लेखावे

असे हे सार धर्माचे
असे हे सार सत्याचे
परार्था प्राणही द्यावे

~साने गुरुजी 


Comments

Popular Posts